Agriculture Gram Crop

फसल में फूल आने के बाद वर्षा होना होता है हानिकारक

जलवायु : चना एक शुष्क एवं ठंडे जलवायु की फसल है, जिसे रबी मौसम में उगाया जाता है। चने की खेती के लिए मध्यम वर्षा (60-90 से.मी. वार्षिक वर्षा) और सर्दी वाले क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त हैं। फसल में फूल आने के बाद वर्षा होना हानिकारक होता है, क्योंकि वर्षा के कारण फूल परागकण एक-दूसरे से चिपक जाते हैं, जिससे बीज नहीं बनते हैं। इसकी खेती के लिए 24-300 सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है। फसल के दाना बनते समय 30 सेल्सियस से कम या 300 सेल्सियस से अधिक तापक्रम हानिकारक रहता है।

भूमि की तैयारी : चने की खेती दोमट भूमियों से मटियार भूमियों में सफलतापूर्वक की जाती है। चने की खेती हल्की से भारी भूमियों में की जाती है। किंतु अधिक जल धारण एवं उचित जल निकास वाली भूमियां सर्वोत्तम रहती हैं। असिंचित अवस्था में मानसून शुरू होने से पूर्व गहरी जुताई करने से रबी के लिए भी नमी संरक्षण होता है। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल तथा दो जुताई देसी हल से की जाती है। फिर पाटा चलाकर खेत को समतल कर लिया जाता है। दीमक प्रभावित खेतों में क्लोरपायरीफास मिलाना चाहिए, इससे कटुआ कीट पर भी नियंत्रण होता है।

बुआई का समय

असिंचित क्षेत्र में : सितंबर के आखिरी सप्ताह एवं अक्तूबर के तीसरे सप्ताह में करनी चाहिए। सिंचित क्षेत्र (पछेती) दिसंबर के तीसरे सप्ताह तक अवश्य संपन्न कर लेना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक : मूंग की 10 टन उपज देने वाली फसल भूमि से 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 4-5 कि.ग्रा. स्फूर 10-12 कि.ग्रा. पोटाश ग्रहण कर लेती है। अत: अधिकतम उपज के लिए पोषक तत्वों की पूर्ति खाद एवं उर्वरकों के माध्यम से करना आवष्यक है। गोबर की खाद या कंपोस्ट पांच टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत की तैयारी के समय देना चाहिए। मूंग की फसल से अच्छी उपज लेने के लिए 20 किलो नत्रजन, 40 किलो स्फूर, 20 किलो पोटाश व 20 किलो सल्फर प्रति हेक्टेयर का उपयोग करना चाहिए। उर्वरक की पूरी मात्रा बुआई के समय कूंड में बीज के नीचे 5-7 सें.मी. की गहराई पर देना लाभप्रद रहता है।

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