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aloe vera

एलोवेरा

एलोवेरा के लिए हल्की से मध्यम किस्म की दोमट, बलुई दोमट, कछारी (एलूवियल) मिट्टी वाले खेत ही चुनें। भारी और चिकनी मिट्टी में बरसात में पानी भरा रहने पर फसल खराब हो सकती है। 200 से 250 क्विंटल गोबर की अच्छी तरह पची और पकी हुई (फरमेंटेड) खाद या शहरी कंपोस्ट खाद खेत में जगह-जगह ढेरियां बनाकर समान रूप से बिखेर दें। इसके बाद दांतेदार बखर (स्पाइक टुथ हेरो) या दतारी चलाकर उसे मिट्टी के साथ अच्छी तरह मिला दें। यदि उपलब्ध हो तो एक बार रोढोवेटर चलाएं।

खुश्क मौसम में इनका होता है अच्छा  विकास

बुआई के लिए डेढ़ से दो फुट की दूरी पर नौ से बारह इंच ऊंची मेढ़ व नालियां बनाएं। शिशु पौधों को एक फुट की दूरी पर लगाया जाता है। लगभग 22 हजार पौधे एक एकड़ के लिए चाहिए। भारी व उपजाऊ मिट्टी में इन्हें कतार में दो फुट व पौधों के बीच डेढ़ फुट की दूरी पर लगाया जाना चाहिए। इस अंतर पर प्रति एकड़ लगभग 15 हजार पौधों की जरूरत होती है।

खरपतवारों को निकालने व पौधों के जड़ क्षेत्र में वायु के संचार के लिए आवश्यकतानुसार निंदाई व गुड़ाई करते रहें। जड़ें खुली दिखें तो उन पर मिट्टी चढ़ाते रहें। ग्वारपाठा के पौधों को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है, परंतु खेत में हल्की नमी बनी रहे व दरारें नहीं पडऩी चाहिए। इससे पत्तों के लुबाब सूखकर सिकुड़ जाते हैं। बरसात के मौसम में संभालना ज्यादा जरूरी होता है। खेत में पानी भर जाए तो निकालने का तत्काल प्रबंध करें। लगातार पानी भरा रहने पर इनके तने (पत्ते) और जड़ के मिलान स्थल पर काला चिकना पदार्थ जमकर गलना शुरू हो जाता है।

नालियों की मिट्टी के साथ मिलाकर करें सिंचाई

खुश्क मौसम में इनका विकास अच्छा होता है। पौधे को पूर्ण विकसित होने में आठ से बारह महीने लग जाते हैं। इसके पौधे की पत्तियों के पूरी तरह बढ़ जाने पर तेजधार वाले चाकू से काट लिया जाता है। इसी पौधे से पुन: नई पत्तियां आने लगती हैं। जब नई पत्तियां आने लगें, उस समय 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 30 किलो स्फुर व 20 कि.ग्रा. पोटाश प्रति एकड़ के हिसाब से नालियों की मिट्टी के साथ मिलाकर सिंचाई कर दें।
एक बार लगाने पर तीन से पांच साल तक उपज ली जा सकती है।

पत्तियों को काटने के बाद दोनों तरफ से कांटे निकाल दें। इसके बाद पत्तों को खड़ा चीरकर बीच का लसीला गूदा अलग बर्तन में एकत्र कर लें। इसे धूप में सुखाकर या बिजली से चलने वाले यांत्रिक सुखावकों में रखकर सुखाया जाता है। यदि क्रीम, पेस्ट या आयुर्वेदिक द्रव या तरल उत्पाद बनाना हो तो इस लुबाब को ऐसे ही उपयोग में लाया जाता है। उस उत्पाद के अनुसार उसका प्रसंस्करण कर लिया जाता है। यदि ग्वारपाठे के एक स्वस्थ पौधे से 400 ग्राम (मि.ली.) गूदा भी निकले तो एक एकड़ के 20000 पौधों से 8000 कि.ग्रा. गूदा प्राप्त होगा। यदि इसका कम से कम बिक्री भाव 100 रु. प्रति कि.ग्रा. भी लगाया जाए तो आठ लाख रुपए होता है। यह सब अनुमानित आकलन है।

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