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देसी गाय का दूध तो दिव्य अमृत है

हरित क्रांति से पहले किसानों और मजदूरों को अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए तथा अपनी पारिवारिक व्यवस्था को चलाने के लिए सभी वस्तुएं और साधन गांव में ही प्राप्त होते थे। गांव में इन जरूरतों को पूरा करने के लिए छोटे-छोटे उद्योग होते थे। कपड़े के लिए जुलाहा, तेल के लिए तेली, लोहे के औजारों के लिए लौहार, लकड़ी के कार्य के लिए बढ़ई, मिट्टी के बर्तनों के लिए कुम्हार, चमड़े के सामानों के लिए चर्मकार, कपड़े सीने के लिए दर्जी आदि सारे कार्य संभालने वाले पारंपरिक लोग ग्रामीण थे।

इन उद्योगों को चलाने के लिए कच्चा माल भी गांव में ही उपलब्ध था। नमक व लोहे को छोड़कर शहर से कुछ भी मंगवाने की जरूरत नहीं थी। इस प्रकार गांव का पैसा गांव से बाहर नहीं जाता था। उल्टा किसान अपनी पैदावार शहर में बेचकर पैसा गांव में लाता था। उनको मालूम हुआ कि किसान सभी संसाधन जरूर खरीदेगा, लेकिन खरीदने के लिए उनके पास पैसा नहीं है तो वह कैसे खरीदेगा?

उनको यह भी मालूम हुआ कि किसान उधारी में हाथी भी खरीदता है, तो क्यों न उसके लिए उधार की व्यवस्था की जाए। इसलिए उन्होंने कर्ज देने के लिए बैंक, सहकारी कर्ज देने वाली सहकारी संस्थाएं आदि की व्यवस्था की।

देसी गाय का दूध तो दिव्य अमृत है, जिससे शरीर का पूरा पोषण होता है

बस अंगूठा लगाने मात्र से सब साधन कर्ज के रूप में किसानों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था खड़ी कर दी गई। किसानों को बीज, खाद और औजार खरीदने के लिए शहर लाने की और गांव की सारी संपत्ति लूटकर विदेशी कंपनियों को देने की तथा उसे विदेश भेजने की सारी कुव्यवस्था निर्मित की गई, जिसका नाम है हरित क्रांति।

हरित क्रांति से पहले हमारे देश में हमारी देसी दुधारू गाय की ओर खींचने की असीम ताकत रखने वाले बैल की उत्तम नस्लें थीं और आज भी हैं। ये असंख्य देसी गाएं हमें जुताई के लिए बैल, खेती के लिए असंख्य जीवाणुओं का महासागर रूपी गोबर और दिव्य औषधि रूपी गोमूत्र देती हंै और साथ में अमृत समान दूध देती हैं। जब इनका उपयोग हमारे खेतों में होता है, तो हमारी भूमि सजीव, सुजला, सुफला बन जाती है और तब ऊपर से किसी कृत्रिम खाद डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

गाय झेबुकूल का प्राणी है। गाय में बॉस इंडिक्स जाति के 21 लक्षण होते हैं

देसी गाय का दूध तो दिव्य अमृत है, जिससे शरीर का पूरा पोषण होता है। यह शरीर को प्रदूषित पानी से होने वाली बीमारियों को भगाकर शरीर को रोगमुक्त करता है। देसी गाय का दूध, गोबर और गोमूत्र के उपयोग से मिलने वाला विषमुक्त खाद्यान्न शरीर में प्रतिरोधी शक्ति पैदा करता है। देसी गाय का दूध-दही प्रतिरोधक शक्ति प्रदान करने वाले जीवाणुओं का मूलाधार है।

हरित क्रांति के माध्यम से हमारी संस्कृति रूपी देसी गाय को निकाल कर उसके स्थान पर विदेशी जर्सी, होलस्टन नाम के जानवर हमारे किसानों पर थोपे गए। वास्तव में यह जर्सी, होलस्टन गाय नहीं है। यह अलग कोई काउपिंग नाम का प्राणी है, क्योंकि गाय का एक भी लक्षण इन विदेशी जानवरों में नहीं मिलता।

गाय झेबुकूल का प्राणी है। गाय में बॉस इंडिक्स जाति के 21 लक्षण होते हैं, जिनमें से एक भी लक्षण इन विदेशी जर्सी, होलस्टीन में नहीं है। तब यह गाय कैसे हो सकती है? इन विदेशी संकर जानवरों को जंतुनाशक दवा हर दिन पिलानी पड़ती है।

इस जंतुनाशक के अवशेष उनके गोबर, मूत्र और दूध में पाए जाते हैं। जब उनका यह गोबर और मूत्र भूमि में जाता है, तो ये जंतुनाशक दवाएं हमारी भूमि के जंतुओं को नष्ट करती हैं। ह्यूमस के निर्माण को रोकती हैं। भूमि को बंजर (बांझ) बनाती हैं। यही तो उनका षड्यंत्र है। जब हम इन विदेशी गायों का दूध पीते हैं, तो ये जंतुनाशक और उनका दूध बढ़ाने के लिए इंजेक्शन के रूप में दिए गए हार्मोन्स हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं, तो इससे हमारी प्रतिरोधक शक्ति नष्ट हो जाती है।

इन जंतुनाशकों से हमारी आंत में हमें प्रतिरोधक शक्ति देने वाले जीवाणुओं का नाश होता है। परिणामस्वरूप हमें कैंसर, डायबिटीज, हार्ट अटैक, एड्स जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं। हम एलोपैथी ट्रीटमेंट लेने के लिए शहरों की ओर दौड़ते हैं, तो गांव का पैसा शहर की ओर भागता है और शहर में सिर्फ कमीशन रहता है। पैसा वहां से विदेश चला जाता है, यही तो वह षड्यंत्रकारी शोषण व्यवस्था चाहती है।
इस षड्यंत्रकारी शोषण व्यवस्था के कारण किसान आत्महत्या करने के लिए बाध्य हो जाते हैं।

किसानों की आत्महत्या के पीछे मूलत: चार कारण हैं :

-पहला कारण, प्रतिवर्ष निरंतर बढ़ता हुआ हर फसल का लागत मूल्य।
-दूसरा, बाजार व्यवस्था।
-तीसरा, प्राकृतिक आपदा और इन सभी कारणों को निरस्त करती है आध्यात्मिक कृषि की जीरो बजट खेती। जीरो बजट खेती में आपको बाजार से कुछ भी खरीदना नहीं है। गांव का पैसा गांव में और शहर का पैसा गांव में, यह हमारा नारा है। शहर के बाजार में बीज, खाद, दवा, ट्रैक्टर और औजार आदि कुछ भी खरीदना नहीं है।

यदि आपके पास एक देसी गाय है, तो आप जीरो बजट कृषि में 30 एकड़ की खेती कर सकते हैं। कुछ भी खरीदना नहीं है तो कर्ज लेने की बात ही कहां आती है? कर्ज नहीं तो आत्महत्या नहीं। जब मंडी में दाम ज्यादा होंगे, तब फसल (उपज) बेचेंगे तो उसे ज्यादा लाभ होगा। लागत का मूल्य शून्य होने पर बेचने वाला दोगुने दाम क्यों करेगा? हमारी जीरो बजट खेती को अमल में लाने वाला किसान भला आत्महत्या क्यों करेगा?

यदि किसानों को आत्महत्याओं से बचाना है, उन्हें कर्जमुक्त करना है, उन्हें जमीन रहित होने से बचाना है, उनके बच्चों को दिहाड़ीदार मजदूर बनने से बचाना है तथा रासायनिक खेती के बुरे प्रभावों से समाज को छुटकारा दिलाना है, तो याद रखें इसका एक ही रास्ता है जीरो बजट खेती (कुदरती खेती)।

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