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vegetable chowlai

चौलाई को गर्मी और बरसात के मौसम में आसानी से उगाया जा सकता है

गर्मी और बरसात के मौसम के लिए चौलाई बहुत ही उपयोगी पत्ती वाली सब्जी है। उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रो में जाड़े कि ऋतू में बहुत सी पत्तीवाली सब्जियां जैसे पालक, सोआ, बथुआ मेंथी, सरसों आदि उपलब्ध रहता है लेकिन सबसे अधिक अभाव गर्मी और बरसात के मौसम में होता है।

चौलाई को गर्मी और बरसात के मौसम में आसानी से उगाया जा सकता है। इसे – अर्ध शुष्क वातावरण में आसानी से उगाया जा सकता है। यह गर्म वातावरण में अधिक उपज देता है इसकी खेती के लिए उपजाऊ भूमि जिसमे कंकर-पत्थर न हो उपयुक्त रहती है इसकी खेती सीमांत भूमियों में भी कि जा सकती है।

भूमि की तैयारी

गृह वाटिका में चौलाई को ऐसी जगह जहां आलू लगाया गया हो या सब्जी आदि लगाई गई हो, उसके खाली होने के बाद उसमें चौलाई की बुआई की जा सकती है। बुआई के लिए भूमि को भली-भांति खुदाई करके जमीन को भुरभुरी बना लेते हैं। भूमि की अंतिम बार तैयारी के समय अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद का मिश्रण मिलाते हैं।

प्रजातियां

छोटी चौलाई : इसके पौधे सीधे बढ़वार वाले तथा छोटे आकार के होते हैं। पत्तियां छोटी तथा हरे रंग की होती हैं। यह किस्म बसंत तथा बरसात में उगाने के लिए उपयुक्त है।

बड़ी चौलाई : इस किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली से विकसित किया गया है। इसकी पत्तियां बड़ी तथा हरे रंग की होती हैं, तने मुलायम एवं हरे रंग के होते हैं। यह ग्रीष्म ऋतु में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है।

बीज बुआई : चौलाई के बीज बहुत छोटे और काले रंग के एवं चमकदार होते हैं। प्रति 10 वर्ग मीटर क्षेत्र के लिए 5 ग्राम बीज पर्याप्त होते हैं।

बुआई : अच्छी प्रकार से तैयार क्यारी में बीज को थोड़ा मिट्टी मिलाकर छिटक देते हैं। चूंकि बीज बहुत छोटे हैं, इसलिए सूखी मिट्टी मिलाकर छिटकने से उनका एक समान वितरण होता है। बीज छिटकने के बाद क्यारी में हल्की सी गुड़ाई करके बीज को मिट्टी में मिला देते हैं। इसके बाद क्यारी की हल्की सिंचाई कर देते हैं।

सिंचाई : पहली सिंचाई बुआई के तुरंत बाद करें, फिर अंकुरण के बाद 4-5 दिन के अंतराल पर गर्मी भर सिंचाई की आवश्यकता होती है, बरसात की फसल में सिंचाई की कोई विशेष आवश्यकता नहीं होती है।

खरपतवार नियंत्रण : रोपाई के 30-35 दिनों बाद हाथों से खरपतवार निकाल देने चाहिए। फिर दूसरी निराई आवश्यकतानुसार करनी चाहिए, जब फसल 30-35 सें.मी. की हो जाए, तो खरपतवारों का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है। इस समय पौधों के तने के ऊपर मिट्टी चढ़ाना जरूरी है।

कटाई : बुआई के 3-4 सप्ताह बाद पौधे कटाई योग्य हो जाते हैं। इसके बाद कटाइयां 8-10 दिन के अंतराल पर करते हैं। एक फसल से 8-10 बार कटाई की जा सकती है।

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