zimikand

जलवायु

अच्छी वनस्पतिक वृद्धि के लिए गर्म तर मौसम एवं कंदों की वृद्धि के लिए ठंडा एवं शुष्क मौसम उत्तम रहता है। बुआई के बाद बीजों के अंकुरण के लिए ऊंचे तापमान की आवश्यकता रहती है। पौधों की समुचित बढ़वार के लिए सामान्य रूप से अच्छी वर्षा होनी चाहिए। कंदों के अच्छे विकास के लिए ठंडे मौसम की आवश्यकता है।

भूमि

जिमीकंद की अधिक उपज लेने के लिए उपजाऊ रेतीली दोमट भूमि अच्छी रहती है। भूमि की जलधारण क्षमता अच्छी होनी चाहिए। रेतीली और चिकनी मिट्टी में जिमीकंद की खेती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इन मृदाओं में इसके कंदों का समुचित विकास नहीं हो पाता है। रोपाई के पूर्व मिट्टी पलटने वाले हल से दो गहरी जुताई करने के बाद दो बार देशी हल चलाकर पाटा लगाकर खेत तैयार कर लेना चाहिए। सिंचाई के अनुसार मेंढ़ें व नालियों का निर्माण कर लेना चाहिए। जुताई से पूर्व 20 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से डाल देनी चाहिए।

बुआई का समय

उत्तर भारत में फरवरी-मार्च और दक्षिणी भारत में मई इसकी बुआई का उपयुक्त समय है।

बीज की मात्रा

आधा किलोग्राम से एक किलो ग्राम के कंद बीज के लिए आर्थिक दृष्टि से उपयुक्त पाए गए है। आधा किलो ग्राम के कंद लगाने पर 50 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है, जबकि एक किलो ग्राम कंद लगाने पर 100 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। कंद में दो आंखें अवश्य होनी चाहिए। बोने के लिए पूरे कंद या कटे कंदों को भी काम में लाया जाता है।

सिंचाई

नमी की कमी रहने पर मानसून से पूर्व एक सिंचाई अवश्य कर दें। यदि वर्षा ऋतु में काफी समय तक वर्षा न हो तो आवश्यकता अनुसार सिंचाई करते रहें। इसकी फसल के लिए उचित जल निकास की आवश्यकता होती है।

उपज

जिमीकंद की उपज भूमि की किस्म, फसल की देखभाल आदि पर निर्भर करती है। इस फसल से 500 ग्राम भार का बीज कंद उपयोग करने पर प्रति हेक्टेयर 400 क्विंटल तक उपज मिल जाती है।

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