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जलवायु एवं भूमि की तैयारी :

भिंडी के उत्पादन हेतु गर्म मौसम अनुकूल होता है। बीजों के अंकुरण हेतु 20 सेंटीग्रेड से कम का तापमान प्रतिकूल होता है। 42 सेंटीग्रेड से अधिक तापमान पर फूल का परागण नहीं होता है एवं फूल गिर जाते हैं। सामान्यत: भिंडी की खेती सभी प्रकार की भूमियों पर की जा सकती है परंतु हल्की दोमट मिट्टी जिसमें पर्याप्त मात्रा में जीवांश उपलब्ध हो एवं उचित जल निकास की सुविधा हो, भिंडी की खेती हेतु श्रेष्ठ होती हैं। भूमि को दो-तीन बार जुताई कर समतल कर लेना चाहिए।

बुआई :

ग्रीष्मकालीन भिंडी की बुआई फरवरी-मार्च में की जाती है। यदि भिंडी की फसल लगातार लेनी है तो तीन सप्ताह के अंतराल पर फरवरी से जुलाई के मध्य अलग-अलग खेतों में भिंडी की बुआई की जा सकती है।

ग्रीष्मकालीन भिंडी की बुआई कतारों में करनी चाहिए। कतार से कतार दूरी 25-30 सें.मी. एवं कतार में पौधे की मध्य दूरी 15-20 से.मी. रखनी चाहिए। वर्षाकालीन भिंडी के लिए कतार से कतार दूरी 40-45 सें.मी. एवं कतारों में पौधे की बीच 25-30 सें.मी. का अंतर रखना उचित रहता है।

पोषण प्रबंधन :

भिंडी की बुआई के दो सप्ताह पूर्व 250-300 क्विंटल सड़ा हुई गोबर खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए। प्रमुख तत्वों में नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश क्रमश: 60 कि.ग्रा., 30 कि.ग्रा. एवं 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के पूर्व भूमि में देनी चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा को दो भागों में 30-40 दिनों के अंतराल पर देना चाहिए।

जलप्रबंधन :

यदि भूमि में पर्याप्त नमी न हो तो बुआई के पूर्व एक सिंचाई करनी चाहिए। गर्मी के मौसम में प्रत्येक पांच से सात दिन के अंतराल पर सिंचाई आवश्यक होती है।

निदाई-गुड़ाई :

नियमित निंदाई-गुड़ाई कर खेत को खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। बोने के 15-20 दिन बाद प्रथम गुड़ाई करना जरूरी रहता है। बासालिन को 1.2 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व को प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त नम खेत में बीज बोने के पूर्व मिलाने से प्रभावी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है।

फल की तोड़ाई एवं उपज :

किस्म की गुणता के अनुसार 45-60 दिनों में फलों की तुड़ाई प्रारंभ की जाती है एवं 4 से 5 दिनों के अंतराल पर नियमित तुड़ाई की जानी चाहिए। ग्रीष्मकालीन भिंडी फसल में उत्पादन 60-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होता है।

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