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lentil crop

जलवायु

मसूर के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है, ऊष्ण-कटिबंधीय व उपोष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों में मसूर शरद ऋतु की फसल के रूप में उगाई जाती है। विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार की जलवायु में मसूर की फसल समुद्री सतह से लगभग 3500 मीटर की ऊंचाई तक उगाई जाती है। पौधों की वृद्धि के लिए अपेक्षाकृत अधिक ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है, अत: भारत में मसूर की फसल रबी की ऋतु में उगाई जाती है।

उन सभी स्थानों पर 80-100 से.मी. तक वार्षिक वर्षा होती है, मसूर की फसल बिना वर्षा के भी उगाई जा सकती है, परंतु कम वर्षा वाले स्थानों पर सिंचाइयों की सुविधा उपलब्ध होना अति आवश्यक है, अधिक वर्षा फसल के लिए हानिकारक होती है। पौधों की वृद्धि के लिए अधिक ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है, परंतु पाले का फसल पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है, पौधों की वानस्पतिक वृद्धि के लिए अपेक्षाकृत उच्च तापक्रम आवश्यक होता है, इस प्रकार फसल वृद्धि की विभिन्न अवस्थाओं 65-85 डिग्री फारेन्हाइट तापक्रम अनुकूल में होता है।

भूमि का चुनाव

फलीदार फसल होने के कारण मसूर की खेती सभी प्रकार की भूमियों पर की जा सकती है। दोमट तथा मध्यम दोमट मिट्टी मसूर की खेती के लिए सबसे उत्तम होती है।

भूमि की तैयारी

देश के विभिन्न भागों में इस फसल के लिए खेत की तैयारी अलग-अलग ढंग से की जाती है, जैसे कुछ स्थानों में धान की खड़ी फसल में ही मसूर के बीज डाल दिए जाते हैं व कुछ जगह खाली पड़े खेतों में डाल देते हैं। मसूर की खेती के लिए भू परिष्करण की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

बोने का समय

देश के विभिन्न क्षेत्रों में अक्तूबर- दिसंबर तक इसकी बुआई की जाती है, शुष्क क्षेत्रों में अगेती बुआई करना लाभदायक है। मध्य अक्तूबर में फसल की बुआई करने पर अंकुरण के लिए काफी नमी मिल जाती है तथा अधिक उपज प्राप्त होती है।

बोने की विधि

उचित अंतरण पर देशी हल की सहायता से कूंड निकालकर मसूर की बुआई की जाती है, मृदा में कम नमी होने पर यह विधि सर्वोत्तम है। मृदा में नमी पर्याप्त मात्रा में होने पर बुआई छिटका विधि से भी करते हैं। यह वैज्ञानिक विधि नहीं है, बुआई के लिए सीडड्रिल का भी प्रयोग किया जाता है।

सिंचाई एवं जल निकास

बुआई के समय मृदा में जल निकास कम होने पर पलेवा करना आवश्यक होता है। मसूर की खेती अधिकतर असिंचित भागों में की जाती है, उचित समय पर सिंचाई करने से असिंचित फसल की उपज 2-2.5 गुना तक की वृद्धि होती है। पहली सिंचाई शाखाएं बनने पर तथा दूसरी सिंचाई फलियां बनते समय करना आवश्यक है, फालतू पानी खेत में ठहरने पर उपज में कमी आती है।

कटाई

मसूर फसल की बुआई तिथि के अनुसार फसल की कटाई की जाती है, अक्तूबर में बोई गई फसल मार्च के अंत तक या अप्रैल के प्रारंभ में काट ली जाती है, कटाई हंसिया की सहायता से फलियां पकने पर करते हैं। कटाई सावधानीपूर्वक करनी चाहिए, जिससे की फलियां न चटख पाएं। एक सप्ताह तक फसल को खलिहान में सुखाकर बैलों की दाय चलाकर दाना अलग कर लिया जाता है। दाना निकालने के लिए थ्रेशर का प्रयोग भी कर सकते हैं। भंडारण में अनाज रखने से पूर्व दानों में नमी की प्रतिशतता 12 प्रतिशत के लगभग होनी चाहिए।

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