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multhi farming

मुलहठी की खेती के लिए गर्म एवं शुष्क जलवायु ज्यादा उपयुक्त

मुलहठी की खेती के लिए गर्म एवं शुष्क जलवायु ज्यादा उपयुक्त पाई जाती है। ऐसे क्षेत्र जहां वार्षिक सुवितरित वर्षा 50 से 100 सेंमी के बीच होती हो अथवा सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था हो वहां इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है…

भूमि

अच्छी जल निकास वाली हल्की दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध हो , मुलहठी की खेती के लिए ज्यादा उपयुक्त पाई जाती है। परीक्षणों में यह पाया गया है कि 6-8.2 पीएच मान वाली मिट्टी में इसकी जड़ों का अच्छा विकास होता है। ज्यादा लवणीय अथवा क्षारीय, अम्लीय, दलदली, छायादार, तथा अत्यधिक रेत वाली मिट्टियां इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।

खेत की तैयारी

क्योंकि मुलहठी की खेती ढाई से 3 वर्षीय फसल के रूप में की जाती है अत: विजाई से पूर्व खेत को अच्छी तरह से तैयार किया जाना आवश्यक होता है। इसके लिए सर्वप्रथम अच्छी प्रकार गहरी जुताई करके खेत को भुरभुरा या समतल बनाया जाता है। इसके बाद प्रति एकड़ 5 टन गोबर तथा कम्पोस्ट खाद अथवा 2 टन केंचुआ खाद के साथ-साथ 100 किलो ग्राम माइक्रो फर्टीसिटीकम्पोस्ट जैविक खाद खेत में अच्छी प्रकार मिला दी जाती है। जिन क्षेत्रों में दीमक का प्रकोप होता है, वहां पर 200-300 किलो ग्राम प्रति एकड़ माइक्रो नीम का खाद प्रयोग किया जाता है ।

प्रजातियां

मुलहठी की रूसी प्रजाति के आधार पर इसकी एक उन्नत शील प्रजाति चौ.चरण सिंह हरियाणा कृषि विवि हिसार द्वारा विकसित की गई है, जिसे हरियाणा मुलहठी (एचएस1) का नाम दिया गया है। मुलहठी की इस प्रजाति में लंबे चौड़े तथा गहरे हरे रंग के पत्ते पाए जाते हैं तथा इससे अपेक्षाकृत काफी लंबी जड़े पैदा होती हैं। 3 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर इस प्रजाति में प्रति एकड़ 28-32 क्विंटल तक उपज प्राप्त होती है, जिसमें ग्लाइसिराइजिक एसिड की मात्रा 7.5 प्रतिशत तक पाई जाती है।

बिजाई

स्फेग्नम मांस में 8-10 दिन तक रखने के उपरांत जब मुलहठी की कलमों में अंकुरण होना प्रारंभ हो जाए तब इन्हें मुख्य खेत में लगा दिया जाता है। बिजाई का उपयुक्त समय जनवरी-फरवरी (सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था होने की स्थिति में) अथवा जुलाई-अगस्त का होता है मुख्य खेत में रोपण करने से पूर्व इन कलमों को नीम के तेल या गौ मूत्र से उपचारित कर बुआई करें।

कलमों की बिजाई करते समय लाइन से लाइन की दूरी 3 फिट तथा पौधे से पौधे कि दूरी डेढ़ फुट रखी जानी चाहिए। कई बार इन कलमों को उठी हुई मेढ़ों पर भी लगाया जाता है। कलमों के रोपण करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि इनका 3/4 भाग जमीन में तिरछा दबाया जाए तथा 1/4 भाग जमीन के ऊपर रहे रोपाई के तुरंत बाद में खेत में हल्का पानी दे देना चाहिए।

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