tinde cultivation

जलवायु

टिंडे की खेती के लिए गर्म और आद्र्र जलवायु की आवश्यकता होती है। यह पाले को सहन करने में बिल्कुल असमर्थ होती है। टिंडे की बुआई गर्मी और वर्षा में की जाती है। अधिक वर्षा और बादल वाले दिन रोग व कीटों के प्रकोप को बढ़ावा देते हैं।

भूमि

इसको कई प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है, किंतु उचित जलधारण क्षमता वाली जीवांशयुक्त हल्की दोमट भूमि इसकी सफल खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। वैसे उदासीन पीएच मान वाली भूमि इसके लिए अच्छी रहती है। नदियों के किनारे वाली भूमि भी इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी गई है।

बोने का समय

फरवरी-मार्च और जून-जुलाई, इसकी बुआई के लिए एक हेक्टेयर में 5-6 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है।

बुआई की विधि

आमतौर से टिंडे की बुआई समतल क्यारियों में की जाती है किंतु डौलियों पर बुआई करना अत्यंत उपयोगी एवं लाभप्रद रहता है। अगेती फसल के लिए 1.5-2 मी. चौड़ी, 15 सें.मी. उठी क्यारियां बनाएं। दो क्यारियों के मध्य एक मीटर चौड़ी नाली छोड़े बीज दोनों क्यारियों के किनारों पर 60 सें.मी. की दूरी पर बोएं बीज को 1.5-2 सें.मी. से अधिक गहरा न बोएं।

सिंचाई

ग्रीष्मकालीन फसल की प्रति सप्ताह सिचाई करें व वर्षाकालीन फसल की सिंचाई वर्षा पर निर्भर रहती है।

खरपतवार नियंत्रण

टिंडे की फसल के साथ अनेक खरपतवार उग आते हैं, जो भूमि से नमी, पोषक तत्व, स्थान, धूप आदि के लिए पौधों से प्रतिस्पर्धा करते हैं जिसके कारण पौधों के विकास, बढ़वार और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इनकी रोकथाम के लिए 2-3 बार निराई-गुड़ाई करके खरपतवार को नष्ट कर देना चाहिए।

तुड़ाई

टिंडे के फलों का चयन उसकी जातियों के ऊपर निर्भर करता है। आमतौर पर बुआई के 40-50 दिनों बाद फलों की तुड़ाई शुरू हो जाती है।

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