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पपीते के लिए मध्य काली और जलोड़ भूमि इसके लिए अच्छी

पपीते के लिए हल्की दोमट या दोमट मृदा, जिसमें जल निकास अच्छा हो सर्वश्रेष्ठ है। इसलिए इसके लिए दोमट, हवादार, काली उपजाऊ भूमि का चयन करना चाहिए और इसका अम्ल्तांक 6.5-7.5 के बीच होना चाहिए तथा पानी बिल्कुल नहीं रुकना चाहिए। मध्य काली और जलोड़ भूमि इसके लिए अच्छी होती है…

जलवायु :

यह मुख्य रूप से ऊष्ण प्रदेशीय फल है, इसके उत्पादन के लिए तापक्रम 22-26 डिग्री सें.ग्रे. के बीच और 10 डिग्री सें.ग्रे. से कम नहीं होना चाहिए, क्योंकि अधिक ठंड तथा पाला इसके शत्रु हैं, जिससे पौधे और फल दोनों ही प्रभावित होते हैं। इसके सकल उत्पादन के लिए तुलनात्मक उच्च तापक्रम, कम आर्द्रता और पर्याप्त नमी की जरूरत है।

नर्सरी तैयार करना और बीज उगाना :

पपीते के उत्पादन के लिए नर्सरी में पौधों को उगाना बहुत महत्व रखता है। इसके लिए बीज की मात्रा एक हेक्टेयर के लिए 500 ग्राम काफी होती है। बीज पूर्ण पका हुआ, अच्छी तरह सूखा हुआ और शीशे के जार या बोतल में रखा हो, जिसका मुंह ढका हो और 6 महीने से पुराना न हो, उपयुक्त है। बोने से पहले बीज को 3 ग्राम केप्टान से एक किलो बीज को पुचारित करना चाहिए।

बीज बोने के लिए क्यारी जो जमीन से ऊंची उठी हुई संकरी होनी चाहिए, इसके अलावा बड़े गमले या लकड़ी के बक्सों का भी प्रयोग कर सकते हैं। इन्हें तैयार करने के लिए पत्ती की खाद, बालू तथा सदी हुई गोबर की खाद को बराबर मात्रा में मिलाकर मिश्रण तैयार कर लेते हैं। जिस स्थान पर नर्सरी हो, उस स्थान की अच्छी जुताई, गुड़ाई करके समस्त कंकड़-पत्थर और खरपतवार निकाल कर साफ कर देना चाहिए तथा जमीन को दो प्रतिशत फोरमिलिन से उपचारित कर लेना चाहिए।

वह स्थान जहां तेज धूप तथा अधिक छाया न आए, चुनना चाहिए। एक एकड़ के लिए 4059 मीटर जमीन में उगाए गए पौधे काफी होते हैं। इसमें 2.5&10&0.5 आकार की क्यारी बनाकर उपरोक्त मिश्रण अच्छी तरह मिला दें और क्यारी को ऊपर से समतल कर दें। इसके बाद मिश्रण की तह लगाकर 1/2 गहराई पर 3&6 के फासले पर पंक्ति बनाकर उपचारित बीज बो दें और फिर 1/2 गोबर की खाद के मिश्रण से ढककर लकड़ी से दबा दें, ताकि बीज ऊपर न रह जाए।

यदि गमलों या बक्सों का उगाने के लिए प्रयोग करें, तो इनमें भी इसी मिश्रण का प्रयोग करें। बोई गई क्यारियों को सूखी घास या पुआल से ढक दें और सुबह-शाम पानी दें। बोने के लगभग 15-20 दिन भीतर बीज जम जाते हैं। जब इन पौधों में 4-5 पत्तियां और ऊंचाई 25 सें.मी. हो जाए, तो दो महीने बाद खेत में प्रतिरोपण करना चाहिए, प्रतिरोपण से पहले गमलों को धूप में रखना चाहिए, ज्यादा सिंचाई करने से सडऩ और उकठा रोग लग जाता है। उत्तरी भारत में नर्सरी में बीज मार्च-अप्रैल, जून-अगस्त में उगाने चाहिए।

प्लास्टिक थैलियों में बीज उगाना

इसके लिए 200 गेज और 20&15 सें.मी. आकार की थैलियों की जरूरत होती है, जिनको किसी कील से नीचे और साइड में छेद कर देते हैं तथा पत्ती की खाद, रेट, गोबर और मिट्टी का मिश्रण बनाकर थैलियों में भर देते हैं। प्रत्येक थैली में दो या तीन बीज बो देते हैं। उचित ऊंचाई होने पर पौधों को खेत में प्रतिरोपण कर देते हैं। प्रतिरोपण करते समय थैली के नीचे का भाग फाड़ देना चाहिए।

गड्ढे की तैयारी तथा पौध रोपण

पौध लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करके खेत को समतल कर लेना चाहिए, ताकि पानी न भर सकें। फिर पपीते के लिए 50&50&50 सें.मी. आकार के गड्ढे 1.5&1.5 मीटर के फासले पर खोद लेने चाहिए और प्रत्येक गड्ढे में 30 ग्राम बीएचसी 10 प्रतिशत डस्ट मिलाकर उपचारित कर लेना चाहिए। ऊंची बढऩे वाली किस्मों के लिए 1.8&1.8 मीटर फासला रखते हैं। पौधे 20-25 सें.मी. के फासले पर लगा देते हैं। पौधे लगते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि गड्ढे को ढक देना चाहिए, जिससे पानी तने से न लगे।

खाद एवं उर्वरक

पपीता जल्दी फल देना शुरू कर देता है। इसलिए इसे अधिक उपजाऊ भूमि की जरूरत है। अत: अच्छी फसल लेने के लिए 200 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फॉस्फोरस एवं 500 ग्राम पोटाश प्रति पौधे की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष प्रति पौधा 20-25 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद, एक कि.ग्रा. बोन मील और एक कि.ग्रा. नीम की खली की जरूरत पड़ती है। खाद की यह मात्रा तीन बार बराबर मात्रा में मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त और अक्तूबर महीनों में देनी चाहिए।

सिंचाई और निराई-गुड़ाई

पानी की कमी तथा निराई-गुड़ाई न होने से पपीते के उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अत: दक्षिण भारत की जलवायु में जाड़े में 8-10 दिन तथा गर्मी में 6 दिन के अंतर पर पानी देना चाहिए। उत्तर भारत में अप्रैल से जून तक सप्ताह में दो बार तथा जाड़े में 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पानी तने को छूने न पाए, अन्यथा पौधे में गलने की बीमारी लगने का अंदेशा रहेगा इसलिए तने के आस-पास मिट्टी ऊंची रखनी चाहिए। पपीते का बाग साफ-सुथरा रहे, इसके लिए प्रत्येक सिंचाई के बाद पेड़ों के चारों तरफ हल्की गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए।

पाले से पेड़ की रक्षा

पौधे को पाले से बचाना बहुत आवश्यक है। इसके लिए नवंबर के अंत में तीन तरफ से अच्छी प्रकार ढक दें एवं पूर्व-दक्षिण दिशा में खुला छोड़ दें। बाग के चारों तरफ हेज लगा दें, जिससे तेज गर्म और ठंडी हवा से बचाव हो जाता है। समय-समय पर धुआं कर देना चाहिए।

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