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नाशपाती एक लोकप्रिय फल

नाशपाती सेब से जुड़ा एक उप-अम्लीय फल है। भारतवर्ष में पैदा होने वाले ठंडे जलवायु के फलों में नाशपाती का महत्व सेब से अधिक है। यह हर साल फल देती है। इसकी कुछ किस्में मैदानी जलवायु में भी पैदा की जाती हैं और उत्तम पैदावार देती हैं। नाशपाती के फल खाने में कुरकुरे, रसदार और स्वादिष्ट होते हैं। ये सेब की अपेक्षा सस्ती बिकती हैं। भारत में लगभग 4,000 एकड़ में इसकी खेती होने लगी है…

मिट्टी तथा जलवायु :

नाशपाती के लिए मिट्टी का चुनाव इसके प्रकंद पर निर्भर करता है। क्विंस तथा जंगली नाशपाती, दो प्रकार के प्रकंदप्रसरण के काम आते हैं। पहले के लिए चिकनी दोमट तथा दूसरे के लिए बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम समझी जाती है। यूरोपीय किस्मों के लिए समशीतोष्ण जलवायु अच्छी होती है। साधारण सहिष्णु किस्में मैदानी जलवायु में भी पैदा की जा सकती है।

पौधे लगाना :

सर्दी के मौसम में जब नाशपाती के पौधे सुषुप्तावस्था में रहते हैं, वृक्षारोपण करना चाहिए। महल पर प्रसारित पौधे 20-25 फुट तथा क्विंस पर प्रसारित पौधे 12-15 फुट की दूरी पर गड्ढे खोदकर लगाना चाहिए।

खाद-सिंचाई :

पूर्ण फलनप्राप्त पेड़ों को दिसंबर के महीने में प्रति पेड़ लगभग दो मन सड़े गोबर की खाद, तीन पाउंड ऐमोनियम सल्फेट तथा एक पाउंड सुपरफॉस्फेट प्रति वर्ष देना चाहिए। खाद की यह मात्रा पेड़ों की बाढ़ तथा फलन में वृद्धि कराती है। मार्च में जब फल मटर के दाने से कुछ बड़े हो जाएं, तब पेड़ों को हफ्तेवार पानी देना चाहिए और जून के मध्य तक इसी प्रकार सिंचाई करते रहना चाहिए। हर पानी के दो या तीन दिन बाद हल्की गुड़ाई, निराई करके थालों को साफ-सुथरा रखना चाहिए।

कांट-छांट :

पेड़ लगाने के दूसरे वर्ष से ही हल्की कांट-छांट करके पौधे को कटोरे का ढांचा देना चाहिए। बाहर की तरफ फैलने वाली शाखाओं को काट छांटकर, पेड़ का फैलाव ऊपर की ओर करना चाहिए। ढांचा प्रतिस्थापित हो जाने के बाद फलवाली टहनियों की हल्की कटाई करते रहना चाहिए। सभी प्रकार की कांट छांट का उचित समय दिसंबर या जनवरी है। कांट छांट के बिना पेड़ झाड़ जैसे बन जाते हैं और फलन भी कम हो जाता है।

फलन :

वसंत के शुरू होते ही पेड़ों पर हरी कोपलें तथा फूल आने शुरू हो जाते हैं। इनके फल जून के अंत में पकने लगते हैं।

विपणन :

नाशपाती के फल को पेड़ पर पूरा नहीं पकने देना चाहिए, क्योंकि यह रस से भर जाता है और उतारने में थोड़ी सी भी खुरच लगने से सडऩे लगता है। ज्यों ही फल की सतह पीली होने लगे तथा उस पर हरे-हरे, छोट-छोटे, गोल निशान भूरे होने लगे, उस समय फलों को सावधानी से उतारना चाहिए।

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