paddy farming

धान की खेती के लिए मटियार एवं दोमट भूमि उपयुक्त मानी गई है…

धान की फसल के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। इसके पौधों को जीवनकाल में औसतन 20 डिग्री सेंटीग्रेट से 37 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान की आवश्यकता होती है। धान की खेती के लिए मटियार एवं दोमट भूमि उपयुक्त मानी गई है…

यूं करें खेतों की तैयारी

धान की फसल के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताइयां कल्टीवेटर से करके खेत तैयार करना चाहिए। साथ ही खेत की मजबूत मेड़बंदी कर देनी चाहिए, जिससे कि वर्षा का पानी अधिक समय तक संचित किया जा सके तथा रोपाई से पूर्व खेत को पानी से भरकर जुताई कर दें और जुताई करते समय खेत को समतल कर लेना चाहिए।

बीज की मात्रा

धान की सीधी बुआई के लिए बीज की मात्रा 40 से 50 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर बोना चाहिए एवं धान की एक हेक्टेयर रोपाई के लिए बीज की मात्रा 30 से 35 किलोग्राम बीज पौध तैयार करने हेतु पर्याप्त होती है। नर्सरी डालने से पहले बीज का शोधन करना अति आवश्यक है। 25 किलोग्राम बीज के लिए 4 ग्राम स्ट्रेपटोसइक्लीन तथा 75 ग्राम थीरम के द्वारा बीज को शोधित करके बुआई करें।

एक हेक्टेयर खेत की रोपाई हेतु 30 से 35 किलोग्राम धान का बीज पौध तैयार करने हेतु पर्याप्त होता है। ट्राईकोडरमा का एक छिड़काव 10 दिन के अंतर पर पौध पर कर देना चाहिए। बुआई के 10-15 दिन बाद पौध पर कीटनाशक व फफूंदीनाशक का छिड़काव करना चाहिए, जिससे कोई कीट व रोग न लग सके ।

पौधों की रोपाई

धान की रोपाई का उपयुक्त समय जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के तीसरे सप्ताह के मध्य है। इसके लिए धान की 21 से 25 दिन की तैयार पौध की रोपाई उपयुक्त होती है। धान रोपाई के लिए पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 20 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर तथा एक स्थान पर 2 से 3 पौधे लगाने चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

धान की अच्छी उपज के लिए खेत में आखिरी जुताई के समय 100 से 150 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद खेत में मिलाते हैं तथा उर्वरक में 120 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस एवं 60 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में प्रयोग करते हैं। नत्रजन की आधी मात्रा फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा खेत तैयार करते समय देते हैं तथा आधी मात्रा नत्रजन की टापड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए।

रोग

धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग सफेद रोग, विषाणु झुलसा, शीथ झुलसा, भूरा धब्बा, जीवाणु धारी, झोका, खैरा इत्यादि हैं। फसल की कटाई एवं उसकी मड़ाई खेत में 50 प्रतिशत बालियां पकने पर पानी निकाल देना चाहिए। 80 से 85 प्रतिशत जब बालियों के दाने सुनहरे रंग के हो जाएं अथवा बाली निकलने के 30 से 35 दिन बाद कटाई करनी चाहिए, क्योंकि इससे दानों को झडऩे से बचाया जा सकता है। अवांछित पौधों को कटाई से पहले ही खेत से निकाल देना चाहिए। कटाई के बाद तुरंत ही मड़ाई करके दाना निकाल लेना चाहिए।

सिंचाई

धान की फसल को सबसे अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है फसल की कुछ विशेष अवस्थाओं में। रोपाई के बाद एक सप्ताह तक कल्ले फूटने, बाली निकलने, फूल निकलने तथा दाना भरते समय खेत में पानी बना रहना अति आवश्यक है।

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