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cultivate zero budget

एक गाय से कर सकते हैं 30 एकड़ में खेती

कृषक बंधुओ! जीरो बजट खेली में महीने में कम से कम एक बार प्रति एकड़ 10 किग्रा. देशी गाय के गोबर तथा 7 लीटर गोमूत्र की जरूरत पड़ती है। एक देशी गाय प्रतिदिन ग्यारह किलोग्राम गोबर तथा 8 लीटर गोमूत्र देती है। एक गाय का एक दिन का गोबर तथा गोमूत्र एक एकड़ भूमि के लिए पर्याप्त है। इस प्रकार एक देशी गाय के गोबर व गोमूत्र से 30 एकड़ की खेती हो सकती है। केवल हमें इसकी विधि सीखनी है। प्रस्तुत पुस्तक में इस विधि का विस्तार से विमोचन किया गया है।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती से जहां एक ओर फसलों का उत्पादन बढ़ता है, वहीं दूसरी ओर भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और साथ ही साथ किसान का लागत मूल्य भी जीरो हो जाता है। यहां वही कहावत 100 प्रतिशत चरित्रार्थ होती दिखती है कि आम के आम, गुठली के दाम। कृषक बंधुओ, यह सृष्टि ईश्वरीय नियमों के अनुसार चल रही है। मानव अपनी अज्ञानता के कारण हमेशा से इस पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करता रहा है, इसीलिए अनेक प्रकार की भीषण समस्याएं हमारे सामने खड़ी हो गई है।

इन सब समस्याओं से निकलने का एकमात्र उपाय है कि हम ईश्वरीय नियमों का पालन सह्दयता से करें और लालच व अज्ञानता को छोड़कर अपनी उन्नति ईश्वरीय नियमों के अनुसार ही करें। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी इसी संदर्भ में कहा था कि कुदरत मनुष्य की जरूरत तो पूरा कर सकती है परंतु उसका लालच नहीं। किसान मित्रो! पृथ्वी के संतुलन का एक मनमोहक चित्र अथर्ववेद के निम्न मंत्र में खींचा गया है-

यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टय: संबभूवु:।
यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमि: पूर्वपेये दधातु।।

इसमें कहा गया है कि यह पृथ्वी समुद्रों, नदियों, झरनों व सरोवरों के जल से सुशोभित है, इस पृथ्वी पर कृषि की जाती है, जिससे अन्न उत्पन्न होता है, उस अन्न से संसार के प्राणधारी करोड़ों जीव-जंतु तृप्ति पाते है, वह उत्पादिका भूमि हमे सभी प्रकार के खाद्य एवं पेय पदार्थों से सुसम्पन्न करें।

कहने का भाव यह है कि जहां इस पृथ्वी को करोड़ों जीव-जंतु अपने-अपने अंशदान से समृद्ध करते थे और तृप्ति पाते थे वहीं हमने उन जीव-जंतुओं को अपनी अज्ञानता व लोभ के कारण मारकर पृथ्वी पर असंतुलन पैदा कर दिया। इस असंतुलन की वजह से इस पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाले वे खाद्य एवं पेय पदार्थ जो हमें तृप्ति देने वाले थे, वे ही आज हमारे लिए प्राणघातक सिद्ध हो रहे हैं।

जीरो बजट प्राकृतिक खेती के गुणों को अधिकारिक लोगों तक पहुंचाया जाए

कृषक बंधुओ! पृथ्वी पर संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है और इस संतुलन को बनाए रखने में जीरो बजट प्राकृतिक खेती अत्यंत सहायक हो सकती है। अब जरूरत इस बात की है कि जीरो बजट प्राकृतिक खेती के गुणों को अधिकारिक लोगों तक पहुंचाया जाए। कुछ महान मुनीषी इस कार्य में दिन-रात जुटे हुए हैं। उन मुनीषियों में कृषि वैज्ञानिक पद्मश्री सुभाष पालेकर जी का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाने योग्य है।

इनके अनथक प्रयासों से लाखों किसान इस जीरो बजट प्राकृतिक खेती को अपनाकर अपनी तथा मानवता की महान सेवा कर रहे हैं। इस पुस्तक में उन्हीं की पद्धति को आदर्श बनाया गया है और में स्वयं भी गुरूकुल कुरूक्षेत्र के 170 एकड़ भूमि में विगत सात वर्षों से इस जीरो बजट प्राकृतिक खेती को अपनाकर अभूतपूर्व सफलता व आनंद प्राप्त कर रहा हूं। ये सारी जानकारी क्रमवार आपने सामने आएगी।

लोभ और अज्ञानता के कारण मानव का व्यवहार सर्वथा विपरीत हो गया

जन्म देने वाली मां और जन्म लेने के बाद मां एवं संतान का भरण-पोषण करने वाली धरती मां से बढ़कर संसार में भला कौन हो सकता है? अथर्ववेद के भूमि सूक्त में कहा गया है कि माता भूमि: पुत्रोडहं पृथिव्या: अर्थात धरती हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। यह मंत्र मां की महिमा से जोड़कर धरती की गरिमा का गान करता है। इस गरिमामयी धरती माता के साथ लोभ और अज्ञानता के कारण मानव का व्यवहार सर्वथा विपरीत हो गया।

अधिक उत्पादन के लालच में मानव ने रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का आंख मूंदकर प्रयोग किया और धरती माता को अनेक समस्याओं से ग्रस्त कर दिया। इन रासायनिक खादों के निरंतर प्रयोग के बावजूद धरती की उत्पादन क्षमता बढ़ी नहीं, अपितु कम हो गई।
विदेश षड्यंत्र के कारण भारतीय किसान उनके जाल में ऐसा फंसा कि सस्य उत्पादन को निर्विघ्न बढ़ाने वाली, अमृततुल्य दूध, दहीं, घी, मक्खन, गोबर व गोमूत्र प्रदान करने वाली देशी गाय की महत्ता को भूल सा गया।

ऋग्वेद में गाय को माता कहकर पुकारा है

जहां एक ओर वैदिक साहित्य भारतीय गाय के गुणों का गुणगान करते हुए नहीं थकते, वहीं देशी-विदेशी वैज्ञानिक भारतीय देशी गायों पर अनुसंधान करने नित्य प्रति उनके गुणों को प्रस्तुत करते रहते हैं। ऋग्वेद में गाय को माता की तरह पालन पोषण करने वाली होने के कारण विश्व की माता कहकर पुकारा है। यजुर्वेद में कहा गया है कि गाय की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है, क्योंकि यह इतने अधिक गुणों से भरी हुई है कि उसकी तुलना हो ही नहीं सकती।

महाभारत में गाय को अमृतकलश कहा है और साथ ही साथ यह भी दर्शाया है कि उसके अतुलनीय गुणों के कारण सारा संसार उसके आगे नतमस्तक है। अनुसंधानकत्र्ताओं का कहना है कि जो गायें दूध देना बंद कर देती हैं, उनके गोबर व गोमूत्र में कुछ अद्भुत गुणों का समावेश हो जाता है। यह इसलिए होता है कि गाय की जो ऊर्जा दूध में खर्च हो रही थी अब वह रूपांतरित होकर उनके गोबर व गोमूत्र में संगृहीत हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि दूध न देने वाली गायों के गोबर व गोमूत्र में फसलों का उत्पन्न करने की क्षमता अधिक आ जाती है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने की भी।

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