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सिस्टम से हार गया बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी

रोहित चौहान। हमीरपुर/ हमीरपुर के सुभाष चंद उन चंद Hockey खिलाडिय़ों में से हैं, जिन्होंने प्रदेश का नाम राष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा किया है। लेकिन, यह हॉकी खिलाड़ी सरकारी सिस्टम के आगे हार गया है। अस्सी के दशक में सात बार नेशनल गेम्स में अपना बेहतर प्रदर्शन करने वाले इस हॉकी खिलाड़ी की अनदेखी हो रही है। इस कारण मजबूरन नेशनल हॉकी प्लेयर को अपना पैतृक व्यवसाय शू मेकर का काम करना पड़ रहा है।  हमीरपुर बाजार के बीचोंबीच अपनी शू मेकर की दुकान चला रहे हैं। सुभाष चंद को अपने बेहतर प्रदर्शन के एवज में न तो कोई लाभ नहीं मिल पाया और न हीं पुरस्कार। सालों से शू मेकर के काम में जुटे नेशनल हॉकी खिलाड़ी सुभाष चंद ने ‘हिमाचल दस्तक’ से मन की बात सांझा की। उन्होंने कहा कि वर्ष 1971 में सीनियर सेकेंडरी बाल स्कूल हमीरपुर में नौवीं कक्षा से ही हॉकी खेलना शुरू किया था। चार बार लगातार स्कूली नेशनल खेलों में हिस्सा ले चुके हैं। तीन बार इंटर कॉलेज चैम्पियनशिप में बेहतर प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। सुभाष चंद ने बताया कि बतौर गोलकीपर सभी मैचों में उत्कृष्ट प्रदर्शन रहा है और इसी बदौलत हिमाचल की टीम को अव्वल स्थान भी मिले।

सिफारिशें व सरकारी तंत्र रही वजह
सुभाष चंद ने बताया कि वह कोलकाता में खेलने के लिए प्रदेश की टीम की तरफ से गए थे। वहां पर भी उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए हिमाचल की टीम को टॉप तीन में जगह बनाने में अपना अहम योगदान दिया था। लेकिन, सिफारिश न होने के कारण उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर खेलने की इजाजत नहीं मिली। उन्हें यह कहकर भी बाहर रखा गया कि प्रदेश सरकार किसी एक खिलाड़ी को ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भेज सकती है, क्योंकि प्रदेश के पास बजट का अभाव है। जिन खिलाडिय़ों की सिफारिशें थी उन खिलाडिय़ों को मौके दिए गए। लेकिन जिन खिलाडिय़ों के पास ऐसा कुछ नहीं था, उन खिलाडिय़ों को सिस्टम के आगे झुकना ही पड़ा।

बच्चे करते हैं सवाल पापा क्यों बने हम खिलाड़ी?
सुभाष ने कहा कि आज उनके बच्चे भी उनसे पूछते हैं कि पापा खेलों से आपको क्या मिला? सुभाष चंद ने बताया कि आज उनके बच्चे भी खेलों में रूचि नहीं रखते हैं। उन्होंने बताया कि कठिन परिस्थितियों को झेलते हुए हॉकी खेल के लिए योगदान दिया है लेकिन, इस योगदान की कद्र किसी ने नहीं की और आज तक किसी भी सरकार ने सुध नहीं ली।

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