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हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए सर्वश्रेष्ठ की ही कामना करते हैं

हर माता-पिता और बच्चे की यही चाहत रहती है कि किसी ऊंचे रैंक वाले शिक्षण संस्थान में दाखिला मिल जाए, तो लाइफ सेट हो जाती। इंजीनियरिंग हो या मेडिकल या कोई अन्य, चाहत सभी की यही होती है कि टॉप कॉलेज में ही बच्चे पढ़ें। यह बात कुछ हद तक सही है कि टॉप रैंक वाले कॉलेजों में बेहतर अवसर और नौकरियों की उपलब्धता अपेक्षाकृत अधिक होती है।

छात्र कोशिश भी करते हैं, पर वहां दाखिला तो कुछ मुठ्ठीभर को ही मिल पाता है। तो इसका यह मतलब तो नहीं कि बाकी बच्चे नाकाबिल हैं या जीवन में असफल हो गए हैं…

हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए सर्वश्रेष्ठ की ही कामना करते हैं। बच्चों के भविष्य से ही उनका भी भविष्य जुड़ा होता है। हमारे देश में बच्चों को ‘सेटल’ करने की प्रवृत्ति होती है। यानी खिंची हुई लकीर पर चलते हुए किसी खास कॉलेज से ग्रेजुएशन, बड़े पैकेज वाली एक नौकरी और फिर शादी। इस पैटर्न में बदलाव से सब घबराते हैं। बच्चा यदि टॉप कॉलेज में पढ़ता है, तो पेरेंट्स का सामाजिक रुतबा बढ़ जाता है। मगर इस सोच का खामियाजा उनके बच्चों को भुगतना पड़ता है।

किसी दबाव में न आएं

चूंकि इन संस्थानों में सभी बच्चे बहुत मेधावी होते हैं, तो वहां जाकर भी प्रतिस्पद्र्धा और प्रतिभा प्रदर्शन का प्रेशर बना रहता है। नतीजा कई बच्चे इन तथाकथित टॉप कॉलेज में पहुंच कर भी हताशा और नैराश्य में डूब जाते हैं। पहले पढ़ाई का और बाद में नौकरियों में भी सर्वश्रेष्ठ बने रहने का मानसिक दबाव इतना अधिक रहता है कि ये जीवन जीने का वास्तविक अर्थ नहीं जान पाते।

जीवन सदा एक चूहा दौड़ होकर रह जाता है। टॉप संस्थानों से पास आउट बच्चे ही सुखी होते हैं, यह सोच गलत है। उन पर भी उतना ही अधिक दबाव होता है जीवन में, जितना इनसे इतर कॉलेजों से पढ़े बच्चों पर। शुरुआत में हो सकता है, टॉप संस्थान के विद्यार्थियों को बेहतर नौकरियों के अवसर प्राप्त होते हैं, परंतु बाद के वर्षों में इंसान की काबिलियत और समझ ही कारगर साबित होती है।

बच्चे यदि असफल हो जाएं

क्या हो यदि पूरी मेहनत और कोशिशों के बाद भी मनचाहे संस्थान में दाखिला न मिले? कुछ नहीं होगा, एक दरवाजा बंद होता है, तो नजर घुमाएं तो दस दूसरी राहें नजर आएंगी। पेरेंट्स या विद्यार्थी कभी भी एक असफलता को अपनी नाकाबिलियत नहीं मानें। अभी तो जिंदगी की शुरुआत है। जिंदगी में मौकों और अवसरों की कमी नहीं।

बच्चे जब प्रवेश परीक्षा में असफल हों, तो माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें संभालें, न कि डांटें और कोसें। कई बार पेरेंट्स दूसरे बच्चों की सफलता की कहानियां सुनाने लगते हैं, जिससे आहत बच्चा व्यथित हो जाता है कि उसने पैरेंट के अरमानों पर पानी फेर दिया। बच्चे के साथ पैरेंट वक्त बिताएं, उसके मन के भय को दूर करें। काउंसलर के पास ले जाने से भी न हिचकिचाएं।

और भी हैं मंजिलें

अपने आसपास यदि नजर फिराएं, तो ऐसे बहुत सुखी-सफल लोग मिलेंगे, जिनके पास इन टॉप संस्थानों की डिग्री नहीं है। वे ऐसी कोई प्रवेश परीक्षा भी पास नहीं कर पाए थे। जैसे माइक्रोसॉफ्ट के सीइओ, सत्या नडाल, पेंटियम के डिजाइनर विनोद धाम, हॉट मेल के सबीर भाटिया, फिर 2009 के केमिस्ट्री के नोबल प्राइज विनर वेंकट रामकृष्णन, जिन्हें 2010 में पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया। इनसे प्रेरणा लेकर खुद को मजबूत करिए।

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