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skill course

रोजगार के मौके हैं यहां देश में ऐसे कई संस्थान हैं, जहां एक सप्ताह से लेकर तीन माह तक के स्किल्स प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं।ये कोर्स आपको कुछ नया करने और आगे बढऩे के लिए बेहद जरूरी हैं। कुछ कोर्स निम्न हैं-

 

ऐप डिवेलपमेंट

अगर आप ऐप डिवेलपमेंट के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहते हैं तो आपको जावा लैंग्वेज आनी जरूरी है। जिन्हें जावा नहीं आती, वे 15 दिन का क्रैश कोर्स करके ऐप डिवेलपमेंट सीख सकते हैं। ऐप डिवेलपमेंट फिलहाल एंड्रॉयड मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए है। कोर्स के बाद आप एंड्रॉयड प्रोजेक्ट पर काम कर सकते हैं।

कम्युनिकेशन स्किल

पर्सनैलिटी निखारने में कम्युनिकेशन स्किल का बहुत बड़ा योगदान है। इस स्किल को बेहतर बनाने के लिए वैसे तो कई चीजें मददगार साबित हो सकती हैं, लेकिन उनमें से कई ऐसी बातें हैं, जो ज्यादा सहायक हैं। यानी शब्दों को चुनते समय सावधानी बरतें और दूसरों की बातों को सही अर्थों में समझने का प्रयास करें।

लैंग्वेज कोर्स

 

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लैंग्वेज कोर्स दो देशों के बीच की भाषाई दूरी को खत्म करते हैं। इससे व्यापारिक रिश्ते मजबूत होते हैं तथा रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। इंग्लिश, रशियन, जैपनीज, यूरोपियन, पर्शियन, चाइनीज, जर्मन, स्पैनिश, फ्रेंच आदि कई ऐसी भाषाएं हैं, जिनकी जानकारी का मतलब रोजगार की गारंटी या नौकरी में तरक्की की राह आसान होना है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में विदेशी भाषा सीखने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। शहर के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी विदेशी भाषा सीखने का क्रेज देखने को मिल रहा है। आप क्रैश कोर्स कर अपने उपलब्ध समय में मनचाही भाषा सीख सकते हैं। स्किल्ड होकर आप दुभाषिए, अनुवादक, टूअर गाइड, टीचिंग आदि कई क्षेत्रों में आसानी से रोजगार ढूंढ सकते हैं।

लीडरशिप स्किल

लीडरशिप यानी नेतृत्व क्षमता का मतलब सिर्फ अधिक मुखर व्यक्तित्व और अधिक बोलचाल ही नहीं है, बल्कि पेशेवरों के अंदर का ज्ञान और व्यवहार कुशलता उसके लीडरशिप स्किल के महत्वपूर्ण घटक हैं। प्रमुख शॉर्ट टर्म कोर्स अथवा ट्रेनिंग प्रोग्राम के जरिए कोई भी लीडरशिप स्किल सीख सकता है। इससे उनका व्यक्तित्व निखरता ही है, कार्यस्थल पर भी उनको कई तरह से लाभ पहुंचाता है। अधिकांश कंपनियां वर्कशॉप के जरिए अपने कर्मचारियों में लीडरशिप का कौशल विकसित करती हैं। इसके अलावा कहीं से कोर्स करके भी इस स्किल
को सीखा जा सकता है।

फिटनेस ट्रेनिंग

फिट रहने का बुखार एक-दो दिनों का खेल नहीं होता, बल्कि इसके पीछे सलीके से की गई मेहनत एवं तकनीक भी होती है। इसके लिए विशेषज्ञों की सलाह या ट्रेनिंग जरूरी है। इन एक्सपर्ट को फिटनेस ट्रेनर की संज्ञा दी जाती है। इस कड़ी में एरोबिक्स एवं योग इंस्ट्रक्टर, पर्सनल एवं कॉरपोरेट ट्रेनर को भी शामिल किया जा सकता है। इसके अंतर्गत उसे ह्यूमन एनाटॉमी, न्यूट्रीशन, डाइट और फिटनेस आदि से जुड़ी जानकारियां रखनी पड़ती हैं। नौकरीपेशा में रहते हुए इस कोर्स को आसानी से किया जा सकता है। इस कोर्स के बाद आप चाहें तो पार्टटाइम भी आय बढ़ा सकते हैं। कोर्स के पश्चात जिम, हेल्थ क्लब, फिटनेस सेंटर, स्कूल-कॉलेज, क्रूज लाइनर, स्पा टूरिस्ट रिजॉट्र्स में आसानी से फुल टाइम जॉब पा सकते हैं।

 

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गेमिंग

इसमें सबसे पहले गेम की स्क्रिप्ट तैयार की जाती है। इसके बाद उसे प्रमुख सॉफ्टवेयरों की सहायता से एनिमेटेड इमेज तैयार कर उसमें मोशन डाला जाता है। इसमें विशेष रूप से स्क्रिप्टिंग, स्कल्पटिंग, मॉडल एनिमेशन, लाइटिंग, टेक्सचरिंग सहित कई विशेषज्ञ शामिल रहते हैं। इससे जुड़े प्रोफेशनल्स स्वतंत्र रूप से भी अपनी सेवाएं दे सकते हैं।

डिजिटल मार्केटिंग

आज पूरा बाजार डिजिटल मार्केटिंग के पैटर्न पर काम कर रहा है। यह न सिर्फ पैसे की बचत करता है, बल्कि नए जमाने का सशक्त करियर भी साबित होता जा रहा है। इसके अंतर्गत ब्रांड एवं प्रोडक्ट को इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचाया जाता है। वर्तमान समय में इस क्षेत्र में रोजगार की संख्या में तेजी से विस्तार हुआ है। यह शॉपिंग, मनोरंजन, सोशल इंटरेक्शन, न्यूज आदि को सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाता है। अधिक संख्या में लोग इस स्रोत का इस्तेमाल कर लाभान्वित हो रहे हैं। इसमें जो भी कोर्स तैयार किए गए हैं, उनमें न्यूनतम आपका सिर्फ बारहवीं उत्तीर्ण होना जरूरी है। ऐसे कोर्सेज आप नौकरी करते-करत भी पार्ट टाइम कर सकते हैं।

बड़े शहरों में छात्र शुरू से ही अपनी पसंद को ध्यान में रखते हुए कई तरह के स्किल सीखते हैं, जबकि गांव-कस्बों के युवाओं को इसमें नाकामी हासिल होती है। नतीजा, उन्हें नौकरी में कदम-कदम पर दिक्कत आती है। ज्यादातर ग्रामीण छात्र परंपरागत कोर्स कर बड़े शहरों में नौकरी तलाशने जाते हैं। लैंग्वेज, कम्युनिकेशन, पे्रजेंटेशन, कंप्यूटर, पर्सनैलिटी आदि कई ऐसे महत्वपूर्ण बिंदु हैं, जिनमें उन्हें परेशानी आती है, क्योंकि ये स्किल्स उनकी प्राथमिकता में शामिल ही नहीं होते। ऐसा नहीं है कि कस्बाई अथवा हिंदी भाषी छात्र क्षमता एवं योग्यता में किसी से कम होते हैं, लेकिन जहां बात मल्टीस्किल की आती है, वहां वे पिछली पंक्ति में खड़े नजर आते हैं।

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