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actor girish karnad

गिरीश कर्नाड ने 1958 में कर्नाटक आट्र्स कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की

गिरीश कर्नाड के निधन के साथ साहित्य और सिनेमा के एक युग का अंत भी हो गया। गिरीश कर्नाड एकमात्र ऐसे अभिनेता थे, जो सिनेमा और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में शीर्ष पर रहे और हर तरह की भूमिकाओं में काम किया। वह जीवन के आखिरी वर्षों तक समाज और राजनीति को लेकर एक एक्टिविस्ट के तौर पर भी अपनी बेबाक राय रखते रहे। आइए एक नजर डालते हैं गिरीश कर्नाड के सफर पर…

गिरीश कर्नाड का जन्म 19 मई 1938 को माथेरन, महाराष्ट्र में हुआ था। उनका पूरा नाम गिरीश रघुनाथ कर्नाड था। उनकी शुरुआती पढ़ाई मराठी में हुई। उन्होंने कन्नड़ भाषा तब सीखी जब परिवार कर्नाटक के धारावाड में शिफ्ट हो गया। उस वक्त कर्नाड की उम्र 14 वर्ष थी। गिरीश कर्नाड ने 1958 में कर्नाटक आट्र्स कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की। उनका विषय गणित था। 1960-63 में उन्होंने इंग्लैंड जाकर आगे की पढ़ाई पूरी की। कर्नाड ने इग्लैंड में दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की।

गिरीश ऑक्सफोर्ड स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट भी बने। कर्नाड ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस चेन्नई में सात साल तक (1963 से 1970) तक काम किया, लेकिन इस काम में कर्नाड का मन नहीं लगा। उन्होंने फुल टाइम लेखन के लिए इस्तीफा दे दिया। कर्नाड ने चेन्नई में स्थानीय थिएटर ग्रुप ‘द मद्रास थिएटर ग्रुप’ के साथ भी काम किया। कर्नाड अमेरिका भी गए और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में पढ़ाया भी।

कर्नाड के जीवन में मां का रहा गहरा असर

कर्नाड की मां कम उम्र में ही विधवा हो गई थीं। कहा जाता है कि उनका बाल विवाह हुआ था। पेशे से कर्नाड की मां नर्स थीं। नर्सिंग की ट्रेनिंग के दौरान कर्नाड की मां को डॉक्टर रघुनाथ कर्नाड से प्यार हुआ था। बाद में उन्होंने आर्य समाज मंदिर में शादी की। उनकी मां ने विधवाओं के लिए बहुत काम किया, यही वजह है कि कर्नाड के जीवन में अपनी मां का गहरा असर रहा।

19 मई 1938 – 10 जून 2019

गिरीश कर्नाड का जन्म 19 मई 1938 को माथेरन, महाराष्ट्र में हुआ था। उनका पूरा नाम गिरीश रघुनाथ कर्नाड था। उनकी शुरुआती पढ़ाई मराठी में हुई। उन्होंने कन्नड़ भाषा तब सीखी जब परिवार कर्नाटक के धारावाड में शिफ्ट हो गया। उस वक्त कर्नाड की उम्र 14 वर्ष थी। गिरीश कर्नाड ने 1958 में कर्नाटक आट्र्स कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की। उनका विषय गणित था। 1960-63 में उन्होंने इंग्लैंड जाकर आगे की पढ़ाई पूरी की। कर्नाड ने इग्लैंड में दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की।

गिरीश ऑक्सफोर्ड स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट भी बने। कर्नाड ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस चेन्नई में सात साल तक (1963 से 1970) तक काम किया, लेकिन इस काम में कर्नाड का मन नहीं लगा। उन्होंने फुल टाइम लेखन के लिए इस्तीफा दे दिया। कर्नाड ने चेन्नई में स्थानीय थिएटर ग्रुप ‘द मद्रास थिएटर ग्रुप’ के साथ भी काम किया। कर्नाड अमेरिका भी गए और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में पढ़ाया भी।

कर्नाड के जीवन में मां का रहा गहरा असर

कर्नाड की मां कम उम्र में ही विधवा हो गई थीं। कहा जाता है कि उनका बाल विवाह हुआ था। पेशे से कर्नाड की मां नर्स थीं। नर्सिंग की ट्रेनिंग के दौरान कर्नाड की मां को डॉक्टर रघुनाथ कर्नाड से प्यार हुआ था। बाद में उन्होंने आर्य समाज मंदिर में शादी की। उनकी मां ने विधवाओं के लिए बहुत काम किया, यही वजह है कि कर्नाड के जीवन में अपनी मां का गहरा असर रहा।

साहित्य में योगदान

कर्नाड ने अपना पहला नाटक ययाति 1961 में लिखा था। कर्नाड ने जब यह नाटक लिखा, उस वक्त वह ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई कर रहे थे। कर्नाड ने महज 26 साल की उम्र में साल 1964 में दूसरा नाटक ‘तुगलक’ लिखा, इसमें मोहम्मद बिन तुगलक के जीवन को बारीकी से बताया गया था। कन्नड़ साहित्य में गिरीश कर्नाड ने बड़ा योगदान दिया। उनके मशहूर नाटकों में 1961 में ‘यताति’, 1972 में ‘हयवदना’, 1988 में ‘नागामनडाला’, 1964 में ‘तुगलक’, ‘अग्निमतु माले’, ‘नगा मंडला’ और ‘अग्नि और बरखा’ शामिल हैं।

गिरीश कर्नाड की कन्नड़ और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में समान पकड़ थी। उन्होंने अपना पहला नाटक कन्नड़ में लिखा था, जिसका बाद में अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया। कन्नड़ नाटक में गिरीश का स्थान वही है, जैसा कि बंगाली में बादल सरकार, मराठी में विजय तेंदुलकर और हिंदी में मोहन राकेश का है। कर्नाड के नाटकों का कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है। कर्नाड के काम को अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया है। कर्नाड को साहित्य के कई बड़े सम्मान मिले।

अभिनय का बोद्धिक चेहरा

सिनेमा में योगदान

गिरीश कर्नाड बतौर लेखक अपनी पहचान बनाना चाहते थे। साहित्य जगत का नामचीन चेहरा बनने के बाद उन्होंने बतौर लेखक फिल्मों में कदम रखा। 1970 में बतौर स्क्रीनराइटर ‘सम्सकारा’ से डेब्यू किया, यह फिल्म यूआर अनंतमूर्ति के नॉवेल पर आधारित थी। कन्नड़ फिल्म के लिए कर्नाड को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इस फिल्म में उन्होंने लीड रोल भी किया था।

1977 में आई हिंदी फिल्म ‘स्वामी’ गिरीश कर्नाड की चर्चित फिल्म थी। इसमें कर्नाड ने शबाना आजमी के साथ मुख्य भूमिका निभाई थी। श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी ‘निशांत’ गिरीश कर्नाड की एक और चर्चित फिल्म थी। इसमें भी शबाना आजमी ने कर्नाड की पत्नी का रोल निभाया था। इसके बाद श्याम बेनेगल की एक और फिल्म ‘मंथन’ में गिरीश कर्नाड ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म को नेशनल अवॉर्ड मिला था। नागेश कुकुनूर की ‘इकबाल’ और ‘डोर’ गिरीश कर्नाड की दो और चर्चित फिल्में हैं।

गिरीश कर्नाड को चार फिल्मफेयर अवॉड्र्स भी मिले थे। उन्होंने ‘वामशा वरिश्का (1971)’ से बतौर डायरेक्टर डेब्यू किया। इस फिल्म के लिए गिरीश को नेशनल अवॉर्ड मिला। उन्होंने हिंदी फिल्मों में आशा, उत्सव, पुकार, एक था टाइगर और टाइगर जिंदा है जैसी फिल्में भी की हैं।
टीवी प्रेजेंटर गिरीश कर्नाड प्रशासित टीवी सीरीज के प्रेजेंटर भी रहे। 90 के दशक में कर्नाड का यह शो दूरदर्शन के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। कर्नाड बतौर प्रेजेंटर जो शो करते थे वो साइंस और नई खोजों पर आधारित था।

टीवी पर दी दस्तक, घर-घर में मिली पहचान

फिल्मों को करने के साथ गिरीश कर्नाड ने दूरदर्शन के शो ‘मालगुडी डेज’ में भी काम किया। 1990 में आए इस शो में उन्होंने स्वामी के पिता मास्टर मंजुनाथ की भूमिका निभाई। यह वो पड़ाव था, जिसने गिरीश कर्नाड को घर-घर में पहचान दिलाई। कर्नाड ने पूर्व राष्ट्रपिता एपीजे अब्दुल कलाम पर बनी ऑडियो बुक विंग्स ऑफ फायर को अपनी आवाज दी।

सशक्त सामाजिक कार्यकर्ता

गिरीश कर्नाड की लेखनी में जितना दम था, उन्होंने उतने ही बेबाक अंदाज में अपनी आवाज को बुलंदी दी। तमाम राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में उनकी सक्रिय भूमिका रही। धर्म की राजनीति और भीड़ की हिंसा पर भी कर्नाड ने तमाम प्रतिरोधों में हिस्सा लिया। कर्नाड ने सीनियर जर्नलिस्ट गौरी लंकेश के मर्डर पर बेबाक अंदाज में आवाज उठाई। वह गौरी लंकेश के मर्डर के एक साल बाद हुई डेथ एनिवर्सरी में पहुंचे थे। उनके नाक में ऑक्सीजन की पाइप लगी थी।

यादगार रोल

साल 1976 में आई फिल्म ‘मंथन’
में गिरीश कर्नाड ने डॉ. राव का किरदार निभाया था। यह फिल्म श्वेत क्रांति
के जनक वर्गीज कुरियर के जीवन से प्रेरित थी।
निशांत फिल्म में गिरीश कर्नाड ने एक स्कूल मास्टर की भूमिका निभाई। फिल्म में गिरीश कर्नाड के साथ शबाना आजमी, अनंत नाग, अमरीश पुरी, स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह सहित कई कलाकार दिखाई दिए थे।
साल 2006 में आई फिल्म ‘डोर’ में गिरीश कर्नाड ने ‘रणधीर सिंह’ का रोल अदा किया था। इस फिल्म में उन्होंने बॉलीवुड एक्ट्रेस आयशा टाकिया के ससुर का किरदार निभाया।
‘इकबाल’ फिल्म में गिरीश कर्नाड ने एक क्रिकेट कोच की भूमिका अदा की थी, उनके इस रोल को कई फिल्म समीक्षकों और क्रिटिक्स की प्रशंसा हासिल हुई थी।
गिरीश कर्नाड, सलमान खान की फिल्म ‘एक था टाइगर’ और ‘टाइगर जिंदा है’ में नजर आए थे। इसमें गिरीश कर्नाड रॉ हेड के तौर पर सलमान खान के बॉस बने थे।

सिनेमा

1971 में बेस्ट डायरेक्टर कैटेगरी में नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित।
1973 में बेस्ट फीचर फिल्म ‘काडू’ के लिए नेशनल अवॉर्ड।
1977 में फिल्म ‘तब्बालियु नीनाडे मागान’ के लिए कन्नड़ बेस्ट फीचर अवॉर्ड।

साहित्य में सर्वोच्च सम्मान

गिरीश कर्नाड को 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 1998 में उन्हें कालिदास सम्मान भी दिया गया है। सिनेमा और साहित्य में योगदान के लिए कर्नाड को भारत सरकार ने 1974 में पद्मश्री, 1992 में पद्म भूषण सम्मान दिया।

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