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Himachal Pradesh named after Solan

हिमाचल स्थापना दिवस पर विशेष ,  राजा दुर्गासिंह की रही है अहम भूमिका

भूपेंद्र ठाकुर। सोलन : हिमाचल प्रदेश का नामकरण करने में सोलन की अहम भूमिका रही है। सोलन रियासत के राजा दुर्गा सिंह ने तत्कालीन नेता डॉ. वाईएस परमार को हिमाचल नाम रखने का सुझाव दिया था। 15 अप्रैल 1948 को पहाड़ी राज्य होने की वजह से प्रदेश का नाम हिमाचल रखा गया। हिमाचल प्रदेश का नामकरण करने में धामी के रहने वाले आचार्य दिवाकर दत्त शर्मा की भी अहम भूमिका रही है।

बताया जाता है कि उस दौरान कुछ नेता हिमाचल का नाम हिमालय प्रांत रखना चाहते थे। आचार्य दिवाकर शर्मा ने तथ्यों के साथ रिपोर्ट पेश की थी कि आखिर क्यों प्रदेश का नाम हिमाचल ही रखा जाए। दरअसल में शिव महापुराण में राजा हिमाचल का वर्णन आता है। हिमालय राज हिमाचल के नाम पर ही इस प्रदेश का नामकरण किया गया था। हिमाचल के नामकरण तक ही प्रदेश के संघर्ष की कहानी समाप्त नहीं होती। इसके बाद हिमाचल प्रदेश में 30 छोटी-बड़ी रियासतों को एकजुट करना सबसे बड़ी चुनौती थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल के अथक प्रयासों के बाद पहाड़ी रियासतों को केंद्र सरकार में मर्ज किया गया।

1952 में पहली बार जब चुनाव हुए तो प्रदेश में मात्र पांच जिले हुआ करते थे। इसमें महासु, सिरमौर, बिलासपुर, चंबा और मंडी शामिल हैं। डॉ. वाईएस परमार प्रदेश के पहले सीएम बने। उनके पहले मंत्रिमंडल में पंडित पदम देव व मंडी से गौरी प्रसाद पहले मंत्री थे। चिंता की बात यह थी कि अभी भी प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल पाया था।

हिमाचल प्रदेश उस दौरान केंद्र शासित राज्य हुआ करता था। इसके बाद वर्ष 1957 में हिमाचल प्रदेश का पंजाब में विलय किए जाने की बात चली। डॉ. वाईएस परमार ने केंद्र सरकार के सामने इस बात का काफी सख्ती के साथ विरोध किया और उन्होंने सीएम पद से त्याग पत्र दे दिया।
डॉ. परमार ने केंद्र सरकार के समक्ष यह बात रखी कि हिमाचल का विलय किसी भी सूरत में नहीं किया जाना था। भले ही प्रदेश को एक यूनियन टेरेटरी के तौर पर चलाया जाए। टेरिटोरियल काउंसिल के चुनाव हुए और कर्म सिंह अध्यक्ष बने। वो दो बार अध्यक्ष रहे। 1963 में यूनियन टैरेटरी के सभी सदस्यों को विधायक का दर्जा दे दिया गया।

फिर से डॉ. वाईएस परमार हिमाचल के सीएम बने और उनके मंत्रिमंडल मेें ठाकुर हरिदास व पदमदेव मंत्री रहे। 1966 में हिमाचल की सीमाओं का विस्तार हुआ और कांगड़ा, शिमला, लाहुल-स्पीति सहित कई क्षेत्रों को पंजाब से अलग करके हिमाचल में शामिल कर दिया गया। आखिर हिमाचल की जीत हुई और प्रदेश को 1972 में पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया।

 

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