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If the leader is in trouble from the counterparty then the government withdraw the notification

जनमंच नहीं प्रपंच कहिए, डांट खाने में बीत रहा अफसरों का संडे, भाजपा चार्जशीट बनाने वाले मुख्यमंत्री अब दे रहे नसीहतें

आपको नेता प्रतिपक्ष बनाने में सरकार ने बहुत देर लगा दी। भाजपा की ओर से भी इस दरियादिली पर बयान फेंंके जा रहे हैं। इस देरी की वजह क्या थी?
मेरा निजी मत है कि नेता प्रतिपक्ष को लेकर हिमाचल विधानसभा में एक कानून बनना चाहिए। ये मसला सरकारों के अधिकार क्षेत्र में रहेगा तो विवाद होते रहेंगे। पड़ोसी राज्य पंजाब से लेकर कई जगह इसके लिए अलग कानून है। विधानसभाएं संसद की परंपराओं और कानून से चलती हैं। संसद में कानून है कि विधायकों की वन टेंथ संख्या पर नेता विपक्ष बनेगा। यहां इस बार एक तिहाई की दलील दी गई। मकसद था कि मुझे ये दर्जा न मिले। इसके पीछे सत्तारूढ़ दल के ही कुछ लोग थे जो खुद चुनाव हार गए। ये रोड़ा अटकाए रखना चाहते थे। अब भी भाजपा के ही लोग बयानबाजी करते हैं। मुझे, मेरे नेता राहुल गांधी ने विधायक दल का नेता बनाया। मेरे लिए ये पद महत्वपूर्ण है। जिसको नेता प्रतिपक्ष बनाने से तकलीफ है, वो अब भी ये अधिसूचना वापस ले लें। इसे खैरात न समझा जाए। इससे विपक्ष न तो झुकेगा न रुकेगा।

सरकार के जनमंच के काफी चर्चे हैं। मुख्यमंत्री भी कह रहे हैं कि कांग्रेस की पीड़ा इस कार्यक्रम के लोकप्रिय होने से है। आपको क्या लगता है? क्या कांग्रेस सच में इससे परेशान है?

ये जनमंच अब सरकार के गले की फांस बनने वाला है। आज इसे जैसे पेश किया जा रहा है, जितना कागजी काम इस पर हो रहा है। कुछ साल बाद इन चि_ियों को लेकर लोग गली मोहल्लों में घूमेंगे जब काम नहीं होंगे। ये नई सोच भी नहीं है। पहले जो प्रशासन जनता के द्वार था, उसे नया लिबास पहनाया गया है। या यूं कहिए कि भाजपा मंडल की बैठक पिछली शाम को करने की व्यवस्था कर इसे राजनीतिक रंग दिया गया है। रेड कारपेट वेल्कम और सरकारी धाम से कुछ नहीं होने वाला। फील्ड अफसर दफ्तरों में आए आवेदन जनमंच के लिए रोक कर रख रहे हैं। नलका, परचा, ततीमा सब जनमंच में जा रहा है। इस कार्यक्रम के बहाने अफसरों और सरकारी कर्मचारियों को भरी सभाओं में फटकारा जा रहा है। धौंस दिखाई जा रही है। कर्मचारियों का एक संडे डांट खाने में ही निकल रहा है। ये प्रपंच ज्यादा है और जनमंच कम।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर कह रहे हैं कि ये बदला-बदली वाली चार्जशीट का रास्ता छोड़ो, पर कांगे्रस ने बात नहीं सुनी और अब एक साल की चार्जशीट बन रही है। क्या आप इससे सहमत हैं?

चार्जशीट की रिवायत उनकी है, हमारी नहीं। पहले एक साल पर चार्जशीट दी, चार साल पर दो फिर दी। खुद चार्जशीट बनाने वाली कमेटी के सदस्य रहे। इन चार्जशीटों में डेरोगेटरी और चरित्र हनन की भाषा प्रयोग की गई। अब नसीहतें दे रहे हैं। नसीहत क्या धमकियां दे रहे हैं कि मेरे पास पांच साल के चि_े पड़े हैं। अपने मन की शांति के लिए इस पर जो करना चाहें कर लें। पिछली दफा भी सरकार थी जो पांच साल जांच करवाते रहे। मिला कुछ नहीं। ये विपक्ष की जिम्मेदारी है कि सरकार में कुछ गलत दिखे तो उसे रोके, जनता के बीच रखे। अभी तो चार्जशीट कमेटी बनाने पर ही इतना हल्ला। यदि इनकी नीयत साफगोई की होती तो अपने नेताओं के खिलाफ दर्ज केस वापस लेने की इतनी जल्दी क्यों है? हम चरित्रहनन नहीं, बल्कि मुद्दों की राजनीति करना चाहते हैं, लेकिन सरकार से दबकर नहीं।

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