News Flash
Law department has changed the stand on tea gardens of Kangra Valley

Land Sealing Act : कहा, पालमपुर में सैन्य छावनी के लिए अधिग्रहण में लैंड सीलिंग एक्ट बाधा नहीं,  राय में मतभेद सामने आने पर राजस्व विभाग ने महाधिवक्ता को भेजी फाइल

राजेश मंढोत्रा। शिमला : लैंड सीलिंग एक्ट की छूट का लाभ ले रहे कांगड़ा घाटी के चाय बागानों पर सरकार के विधि विभाग ने अपना स्टैंड बदल दिया है। पालमपुर के पास सैन्य छावनी के लिए 700 बीघा से ज्यादा निजी भूमि अधिग्रहित करने के केस में लॉ ने कहा है कि इसमें लैंड सीलिंग एक्ट बाधा नहीं है और यह किया जा सकता है।

इससे पहले पूर्व कांग्रेस सरकार के समय यही प्रस्ताव दो बार रिजेक्ट हो चुका था। अब राय में मतभेद आने के बाद राज्य सरकार ने महा अधिवक्ता को फाइल भेजकर उनसे राय मांगी है। लोकसभा चुनाव से फ्री होने के बाद सरकार को इस मसले पर फैसला करना होगा। रक्षा मंत्रालय पालमपुर के आसपास चाय बागानों की इस जमीन को लेना चाहता है। पहले यह आवेदन कांगड़ा में स्थित सैन्य छावनी के एक कमांडर की ओर से था। पूर्व सरकार में ही इस पर राजस्व विभाग ने आपत्ति लगाई थी कि यदि सेना जमीन लेना चाहती है, तो मंत्रालय सरकार से मामला उठाए, एक कमांडर नहीं। फिर रक्षा मंत्रालय से पत्र आ गया। इस पर सरकार बदलने के बाद लॉ से फिर राय ली गई तो इसमें स्टैंड बदल गया है।

गौरतलब है कि राज्य में लैंड सीलिंग एक्ट 1972 के तहत कोई भी व्यक्ति 150 बीघा से ज्यादा जमीन नहीं रख सकता। लेकिन चाय बागान इससे बाहर रखे गए हैं, लेकिन इनके बेचने पर प्रतिबंध है। पूर्व कांग्रेस सरकार के आखिरी साल में इस बारे में काफी कोशिश हुई कि छूट दे दी जाए, लेकिन हिमाचल हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट तक के ऑर्डर बीच में होने के कारण सरकार यह कर नहीं पाई। लेकिन अब रक्षा मंत्रालय के अधिग्रहण के नाम पर प्रस्ताव डाला गया है। राज्य सरकार ने लैंड सीलिंग एक्ट की धारा 4, 5, 6 और 7 में प्रावधान किए हैं कि यह जमीन न तो बेची जाएगी, न ही एग्रीमेंट या कांट्रेक्ट के माध्यम से ट्रांसफर होगी।

इन प्रावधानों को हाईकोर्ट ने 2013 में दिए अपने फैसले में सही ठहराया था। यहां तक कि पूर्व कांग्रेस सरकार के समय टी टूरिज्म नाम से एक पॉलिसी बनाने की कोशिश भी हुई थी, ताकि चाय बागान के बीच खाली पड़ी जमीन को पर्यटन गतिविधियों के लिए प्रयोग किया जा सके। यह भी हकीकत है कि राज्य के करीब दो हजार बीघा के ये चाय बागीचे कमर्शियल तौर पर अब चल भी नहीं रहे हैं। चाय उत्पादन की लागत इतनी ज्यादा है कि छोटे बागीचों वाले इन्हें झेल नहीं पा रहे हैं।

सीएम अनुमति देने के पक्ष में नहीं

इस मसले पर ‘हिमाचल दस्तक’ ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से भी संपर्क किया। उनका कहना था कि यह मामला मेरे संज्ञान में अभी नहीं लाया गया है। महाधिवक्ता से राजस्व विभाग ने पूछा होगा। जहां तक मेरा निजी तौर पर मानना है कि इस तरह एक केस के लिए छूट देंगे, तो बाद में बाकियों को इनकार करना मुश्किल होगा। चाय बागीचों के तहत आने वाली भूमि पर बहुत पहले से कई नजरें हैं। इसलिए इस बारे में पूरी तरह विचार होगा और जो प्रदेश हित में होगा, सरकार वही फैसला लेगी। चाहे जमीन रक्षा मंत्रालय को चाहिए हो या किसी और को।

Career Counsling

Get free career counsling and pursue your dreams