बेटों से कम नहीं हैं बेटियां

हिमाचल दस्तक। चंडीगढ़
बेटियां किसी भी लिहाज से बेटों से कम नहीं होतीं। जरूरत सिर्फ बेटियों को संस्कार देने के साथ उनका उत्साह बढ़ाने की है। बेटी हर वह काम कर सकती है, जिसकी आस बेटों से की जाती है। कुछ ऐसी ही अंबाला के एक साधारण परिवार की बेटी स्नेहा ने करके दिखाया है। इस बेटी ने मुसीबत की घड़ी में अपने परिवार को बेटा बनकर ही नहीं दिखाया, अपितु समाज के लिए भी एक मिसाल पेश की है। अंबाला शहर के कमल बिहार में रहने वाली स्नेहा ने साबित कर दिया है कि बेटियां केवल चूल्हा-चौका करने तक ही सीमित नहीं हैं।

स्नेहा ने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की है। परीक्षा में स्नेहा ने 68 फीसदी अंक भी अर्जित किए। स्नेहा ग्याहरवीं कक्षा में दाखिला लेना चाहती थी, लेकिन इसकी यह इच्छा पूरी हो पाती, इससे पहले ही इसके पिता दुर्घटनाग्रस्त हो गए। कुछ दिन इलाज चलता रहा और घर में रखे पैसे भी खर्च हो गए। डॉक्टरों ने उपचार अभी लंबा चलने की बात कह दी।

स्नेहा के पिता ई-रिक्शा चलाकर घर का गुजारा चलाते थे। सो घर के हालात को देखते हुए स्नेहा भी ई-रिक्शा का हैंडल थाम लिया। कुछ दिन तो बगल में अपने पिता को बिठाकर रिक्शा चलाती रही, लेकिन आज यह लड़की खुद ही ई-रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पाल रही है। इसके साथ अपनी छोटी बहन और दो छोटे भाईयों की पढ़ाई का खर्च भी उठा रही है।

बाईक चलाना जानती थी, अब थामा ई-रिक्शा का हैंडल

स्नेहा के मुताबिक उसे बाइक चलाना आता था। जब भी किसी की बाइक मिलती थी तो उसे चला लिया करती थी। सिर्फ इतना सा अनुभव था, जिसके सहारे स्नेहा ने परिवार की गाड़ी चलाने की हिम्मत जुटा ली। हालांकि पिता ई-रिक्शा चलाकर परिवार को पालते थे, लेकिन इससे पहले कभी ई-रिक्शा का हैंडल नहीं थामा था। स्नेहा कहती है कि उसके माता-पिता उस पर पूरा भरोसा करते हैं, इसलिए ई-रिक्शा चलाने से रोकने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

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