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पीड़ा से उबरने के लिए वक्त पर कोशिश न की जाए, तो यह पहले अवसाद और फिर बीमारी में बदल सकता है

अगर हम अपने मन में किसी बात को लेकर घुटते रहेंगे, लोगों को दिखाने के लिए ऊपरी मन से हंसने या सबल होने का नाटक करते रहेंगे, तो हम स्वयं के साथ बहुत बड़ा पाप करेंगे। ऐसा करना सेहत के लिए घातक होने के साथ खुद को मानसिक रूप से भी निर्बल बना देता है। इसलिए ज्यादा सोचने की बजाय, जो करीबी लगे, उसके साथ अपने मन की बात करें, दिल का गुबार निकाल दें, बेशक खूब रो भी लें।

हमारे समाज में अकसर मनोचिकित्सक से मिलने का यही अर्थ लगाया जाता है कि इसका दिमाग चल गया है, यानी पागल हो गया है। यह बात बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं कि काउंसलिंग या सलाह-मशविरे के लिए भी ऐसे डॉक्टर के पास जाया जाता है। ‘लोग क्या कहेंगे,’ यही बातें सोचकर कई बार हम अपने मन की व्यथा को दूसरे के साथ साझा नहीं करते।

दुखी होने के बावजूद हम हंसने का नाटक इसलिए करते हैं कि दूसरों के सामने खुद को मजबूत साबित कर सकें। ऐसा करके हम खुद को किसी बड़ी बीमारी की चपेट में ला देते हैं। ऐसी स्थिति में ‘लोग क्या कहेंगे’ इस बात को अनदेखा कर मनोचिकित्सक से जरूर मिलना चाहिए…

अगर दुख है तो दुखी दिखने में कोई हर्ज नहीं है। सिर्फ इसलिए अपने मन पर बोझ लेकर नहीं चलना चाहिए कि हमें मजबूत दिखना है, यह अपने जीवन के साथ धोखा करने जैसा है।

अमूमन होता यह है कि जब किसी संवेदनशील और भावुक व्यक्ति के जीवन में कोई दुख अचानक आता है, तो उसका विचलित हो जाना स्वभाविक है। उस पीड़ा से उबरने के लिए वक्त पर कोशिश न की जाए, तो यह पहले अवसाद और फिर बीमारी में बदल सकता है। ऐसे तमाम लोग हैं, जिनकी जिंदगी में ऐसे पल आते हैं, जब वे अवसाद में चले जाते हैं या आत्महत्या जैसे ख्याल मन में आते हैं। ऐसे में ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसे बिना मतलब के तर्क अपने मन से निकालकर किसी मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। जरूरी परामर्श के साथ कुछ दवाएं समय रहते लेने से सबकुछ ठीक होने की गुंजाइश होती है।

कोई बुरी खबर मिलने या जीवन में अचानक किसी बदलाव से भी भावनात्मक चोट पहुंचती है और असंतुलन की स्थिति में हमारा पूरा व्यवहार बदल जाता है। इसका असर हमारे घरेलू और अन्य रिश्तों पर पड़ता है। हमारा कामकाज भी प्रभावित होता है। इन परिस्थितियों में बीमार होने और अपने-आप से लडऩे से अच्छा है कि किसी काउंसलर की सलाह ली जाए, ताकि अवसाद और आत्महत्या जैसे ख्याल आपके मन में न आएं।

विदेशों में तो अकसर छोटी से छोटी बात के लिए लोग काउंसलर्स के पास जाते हैं। लेकिन हमारे यहां ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसी अवधारणा के चलते लोग खुद को तनावग्रस्त कर लेते हैं, अवसाद में चले जाते हैं, परंतु डॉक्टरों के पास नहीं जाते। इसलिए ऐसी किसी भी स्थिति में अवसाद में जाकर खुद के व्यक्तित्व को समाप्त करने की बजाय संकोच को छोड़ देना चाहिए। इसे सामान्य बीमारी की तरह समझते हुए डॉक्टरों से मशविरा करना चाहिए।

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