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दो चुनाव से भाजपा और कांग्रेस को नकार रहा है कांगड़ा

अजय सहगल। कांगड़ा
विधानसभा क्षेत्र कांगड़ा का राजनीतिक इतिहास बहुत ही दिलचस्प रहा है। पिछले पांच चुनाव में कोई भी सिटिंग MLA रिपीट नहीं कर पाया। दिलचस्प यह भी है कि पिछले दो चुनाव से कांगड़ा की जनता भाजपा या कांग्रेस के प्रत्याशियों को नकारती आ रही है। 2007 में इस सीट से बसपा कैंडिटेट जीते थे, तो 2012 के चुनाव में लोगों ने आजाद प्रत्याशी को विधानसभा भेजा।

पिछले पांच चुनाव में कांगड़ा हलके से हर बार विधायक बदला गया है। अबकी बार भी दोनों पार्टियों की टिकट के लिए जद्दोजहद हो रही है। दोनों पार्टियों की टिकटों की घोषणा होने के बाद टिकट के अन्य चाहवानों का क्या रवैया रहता है। इसके बाद ही कांगड़ा से किसी न किसी के विधानसभा जाने का रास्ता तय होगा।

कांग्रेस ने दिया था महिला को टिकट

कांगड़ा विधानसभा क्षेत्र में किसी भी बड़ी पार्टी ने महिलाओं को चुनाव लडऩे का मौका नहीं दिया। कांग्रेस ने महज एक बार 1985 में पुष्पा चौधरी को चुनाव मैदान में उतारा गया था, लेकिन वे चुनाव हार गई थीं। इससे पहले या बाद में न तो कांग्रेस ने यहां महिला प्रत्याशी को चुनाव में उतारा और न भाजपा ने ही महिला कैंडिडेट को आगे करने की सोची।

सिर्फ विद्यासागर ने लगाया है चौका

कांगड़ा से किसी ने लंबी सियासी पारी खेली है, तो वह हैं चौधरी विद्यासागर। चौधरी पहली बार 1982 में विधानसभा पहुंचे और इसके बाद 1985 और 1990 के चुनाव में भी उनकी जीत का क्रम जारी रहा। 1993 के चुनाव में कांग्रेस के दौलत चौधरी ने विद्यासागर को शिकस्त दी थी। इसके बाद 1998 में चौधरी विद्यासागर चौथी बार जीत दर्ज करवाकर विधानसभा पहुंचे थे। चौधरी विद्यासागर से पहले विधानसभा में लगातार दूसरी बार एंट्री मारने वाले कांग्रेस के चौधरी हरी राम ही थे। इनके अलावा किसी भी विधायक को लगातार दूसरी पारी खेलने का मौका नहीं मिला।

 

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