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Baba does not know Bengali, young generation ...

बिलासपुर के आराध्य संत थे बाबा बंगाली

हिमाचल दस्तक। कुलदीप चंदेल । बिलासपुर : कंप्यूटर इंटरनेट के युग में विचरने वाली नई पीढ़ी बिलासपुर के महान संत बंगाली के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं रखती है। यहां बस अडडे के साथ श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर परिसर में लगी बाबा बंगाली की मूर्ति राजा आनंद चंद ने बनवाई थी। संगमरमर की बनी इस भव्य मूर्ति को देखकर लोगों का माथा अनायास ही बाबा के चरणों में झुक जाता है।

मूर्ति पर विक्रमी संवत 1888( ? ) – 1995 लिखा हुआ है। जिससे पता चलता है कि बाबा का जन्म लगभग 187 वर्ष पहले हुआ था। और उनका महाप्रयाण अस्सी वर्ष पहले हुआ था। गोविंद सागर झील में डूबे पुराने ऐतिहासिक बिलासपुर शहर में बाबा बंगाली छात्रों के हाई स्कूल के बाहर एक झोंपड़ी में रहते थे। उन्हें प्रतिदिन सुबह व शाम राज महल से भोजन का थाल आता था। वह भोजन बाबा वहां बैठे भक्तों में बांट देते थे। खुद शहर में पांच घर घुमकर अलख जगाते , भिक्षा में जो मिलता। उससे तृप्त हो जाया करते थे। कहा जाता है कि बाबा बंगाली पुराने समय में घुमते घामते बंगाल से आए थे। वो किसी राज परिवार से संबंधित बताए जाते थे।

अक्सर स्कूल के बाहर झोंपडी मेें बैठे बैठे यदि कोई अध्यापक स्कूल में बच्चों को पीटता दिखाई देता, तो उससे लडऩे चले जाते थे। डांट डपट करके ही वापिस आते थे। बाबा बंगाली हमेशा लंघोटी में रहते और काक आसन में बैठा करते थे। एक बार वह भिक्षा मांगने अजुध्या नाम की गरीब विधवा ब्राहमणी के आंगन में जा पहुंचे। बाबा को अपने घर में आए देख अजुध्या की खुशी का ठिकाना न रहा। बाबा ने पूछा घर का धनी (मर्द) कहा हैं? अजुध्या बोली महाराज वह वहां गया है , जहां से कोई लौट कर नहीं आता। यह कहकर वह घर के अंदर भिक्षा लाने चली गई। उधर, बाबा उठा और घर से बाहर चला गया। जब अजुध्या वापिस आई तो बाबा दूर गली में जा रहा था। उस बुढिया ने बाबा बाबा कहकर आवाज दी। मगर बाबा बंगाली नहीं रूके।

अजुध्या ने इस लेखक को कभी बताया था कि बाबा ने सोचा कि इसके घर कोई कमाने वाला नहीं है। इसलिए इससे भिक्षा नहीं ली जाए। और वह चला गया। बाबा बंगाली को राजा की जो बात अच्छी नहीं लगती थी। वह बात साफ – साफ कह दिया करते थे। एक बार कुछ चाटुकारों ने राजा के कान भरे और पुराने शहर के सांढू मैदान में गायों के चरने पर पांबदी लगवा दी। लोग परेशान होकर बाबा बंगाली के पास फरियाद करने चले गए। बाबा ने राजा को अपने आदेश वापिस लेने को कहा। लेकि न राजा नहीं माना। बाबा ने गुस्से में कहा कि जा मैं तेरी रियासत में नहीं रहंूगा और डंडा कर्मडल उठा कर चले गए। सारे शहर में हाहाकार मच गया।

राज महल भी सन्न रह गया। राजा ने तरकीब सोची, उसने स्कूल के बच्चों को छुटटी करके बाबा के पीछे वापिस लाने के लिए दौड़ा दिया। आखिर बच्चों ने बाबा को जगातखाना के पास आवाजें लगाक र रोक लिया। बाबा ने कहा कि वापिस जाओ। बच्चे बोले आप चलेेंगे तो जाएंगे ,नहीं तो हम भी आपके साथ चलेंगे। आखिर बाल हट के आगे संत का हठ कुंद पड़ा और बाबा लौट आया। शहर में खुशियां छा गई।

 बिलासपुर

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