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badke da tadka

कांग्रेसी स्याणे जागते नहीं, संघी स्याणे सोते नहीं…

बड़ी अजब-गजब चर्चा चली हुई थी। बड़का भी टांग फंसाने पहुंच गया। मुद्दा था कि संघियों के स्याणे सोते नहीं हैं और कांग्रेसियों के जागते ही नहीं हैं। एक बंदा उदाहरण दे रहा था कि बीजेपी में शांता कुमार की अक्ख कभी लगती नहीं, धूमल साब की पुतलियां कभी मिलती नहीं, तो कांग्रेसी राजा साहब की आंखों की पलकें आपस में इतना प्यार रखती हैं कि अक्सर आपस में मिलन समारोह करती रहती हैं। फिर से ताजे-ताजे कांग्रेसी बणे पंडत सुखराम भी सो जाते हैं। बंदे की इस रडार रूपी खोज से भीड़ में यह सत्संग सुण रहे लोग खासे अचंभित थे।

बड़के को बड़ी पेट दर्द हुई कि उसके मुकाबले में एक और छुटभैया कैसे आ गया? तड़के लगाणा उसका काम है, यह आम बंदा कैसे गप्प-वाचक बण गया? बड़के ने तुरंत अपणी थर्ड क्लास औकात दिखा दी। बोला, इसमें कौण सा बड़ा राज है? जो जाग रहे हैं, उन्होंने कौण से पहाड़ उखाड़ देणें हैं और जो सो रहे हैं उन्होंने कौण सी लंका जित्त लेणी है? दोनों पार्टियों के यह नेते वक्त के मारे हुए हैं।

भाजपा के नेशनल लीडरों ने शांता-धूमल का कक्ख भी नहीं छोड़ा है तो इनको नींद आएगी भी कैसे? विधानसभा चुनावों में धूमल साहब की निंदिया चुरा ली तो लोकसभा में शांता कुमार की नींद हराम कर दी। अब यह दोनों जागेंगे नहीं तो क्या करेंगे? बचे राजा ते पंडत सुखराम, इनको निंदर इस वजह से है कि दोनों ने जब भी सत्ता को भोगा है, डट कर भोगा है। अब इनको न कोई गम है, न चाहत।

राजाजी का मुन्नू सेटल है, पंडत जी का मुन्नू भी थोड़ा अंसटेबल है, पोतरु भी सियासत के पालने में हाथ-पांव चलाणे शुरू हो गया है, तो वह भी झपकी ले रहे हैं। ऐसे में ताजे-ताजे दुख और पुराणे सुखों में फर्क समझो मुओ, जिस तरह से कोई बेवजह बेवफा नहीं होता, वैसे ही बेवजह कोई सुखी या दुखी नहीं होता…

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