high court

चंबा से आए मामले में कोर्ट ने साफ की स्थिति

विधि संवाददाता। शिमला
हाईकोर्ट ने अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्र से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया कि केवल अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति से विवाह करने पर कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जनजाति की श्रेणी को मिलने वाले लाभ का पात्र नहीं बन जाता। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल व न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने विजयलक्ष्मी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया।

याचिका में दिए तथ्यों के अनुसार याचिकाकर्ता जो कि ब्राह्मण परिवार में पैदा हुई थी व उत्तर प्रदेश राज्य से संबंध रखती थी उसने वर्ष 1972 में चंबा जिले के गद्दी राजपूत से शादी की थी । याचिकाकर्ता को वर्ष 1985 में अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र मिलने के पश्चात उसे केंद्रीय विद्यालय संगठन में वर्ष 1986 में प्राइमरी टीचर के पद पर नौकरी मिल गई थी। वर्ष 2011 में 25 वर्ष की सेवा पूरी करने के पश्चात उसको इस कारण चार्जशीट जारी की गई कि उसने झूठे जनजाति के प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल कर ली।

हालांकि प्रार्थी ने इस आरोप को गलत बताया, मगर 23 दिसंबर 2014 को नायब तहसीलदार उप तहसील होली ने उसे कारण बताओ नोटिस जारी करने के पश्चात उसे वर्ष 1986 में जारी जनजाति प्रमाण पत्र को रद कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष याचिका दायर की गई थी, मगर हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों से असहमति जताते हुए उसकी याचिका को खारिज कर दिया।

Comments

Coming soon

Career Counsling

Get free career counsling and pursue your dreams