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changed traditions

खोड़ी गोबिंद सागर में डूबे पुराने शहर में भी मनाई जाती रही है

कुलदीप चंदेल। बिलासपुर
लोहड़ी के त्यौहार से एक दिन पहले मनाई जाने वाली खोड़ी अब बिलासपुर में नहीं मनाई जाती। खोड़ी गोबिंद सागर में डूबे पुराने शहर में भी मनाई जाती रही है। वक्त बदला, तो कई परंपराएं भी बदल गईं। खोड़ी अब बुजुर्गों की जुबां पर ही रह गई हैं। लोहड़ी के अवसर पर यहां बुजुर्गों को खोड़ी की याद आना स्वभाविक है।

पुराने बिलासपुर शहर में लोहड़ी पर जलने वाले लकड़ी के अंगीठों के लिए लड़के लोगों से उनकी लाठियां तथा लकड़ी का दूसरा सामान भी अंगीठे को भेंट कर देते थे। लोहड़ी से पहले का दिन खोड़ी के रूप में जाना जाता था। गांव से यदि कोई व्यक्ति इस दिन लकड़ी का गट्ठर लेकर बेचने के लिए जाता तो लड़के उससे गट्ठर छीन लेते थे। यदि कोई विरोध करता, तो बड़े लोग उस व्यक्ति को यह कहकर डांट देते कि आज खोड़ी है।

पूर्व भाजपा नेता व पूर्व पार्षद राजेंद्र पाल दास ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि पुराने शहर के गोहर बाजार में एक बार खोड़ी के अवसर पर उन्होंने एक व्यक्ति की लाठी छीन ली तो वह उन्हें मारने दौड़ा।

इतने में सामने की दुकान से मस्त राम जी उठे और उस व्यक्ति को झाड़ते हुए कहा कि …बाबू आज खोड़ी है। बच्चों को क्यों डरा रहा है। इन्हें पैसे दे और अपनी लाठी ले ले। मतलब साफ था कि अंगीठे का आयोजन करने वाले लड़के पैसे लेकर ही बाजार से गुजरने वालों की लाठी आदि छोड़ते थे।

लोहड़ी से लगभग बीस दिन पहले चुपचाप इधर-उधर से पेड़ काटे जाते और पेड़ की काट-छांट की जाती। फिर उस लकड़ी को मौहल्ले के ही किसी गुप्त स्थान पर रख दिया जाता था। मौहल्ले के लड़कों को अंदेशा रहता कि कहीं दूसरे मोहल्ले के लड़के लकड़ी चुराकर न ले जाएं। इसलिए सबकी नजर अंगीठे के लिए एकत्रित की हुई लकड़ी पर रहती थी। वास्तव में खोड़ी की परंपरा गजब की थी। कई वरिष्ठ नागरिक जानबूझकर खोड़ी के अवसर पर घर से बाजार घूमने के लिए लकड़ी का बैंत लेकर निकलते थे।

जैसे ही बाजार में लड़के बैंत के लिए छीना-छपटी करते तो वह भी नाटकीय अंदाज में बच्चों से पीछा छुड़वाने का प्रयत्न करते। लेकिन थोडे से विरोध के बाद वह लड़कों को जेब से पैसे निकालकर देते और उनकी खुशी में स्वयं भी आनंद मनाते। शाम को जब अंगीठा जलता तो रेवडिय़ां मूंगफलियां, तिल गुड़ के लड्डू वहां लोगों को बांटे जाते थे। अब पुराना बिलासपर भी नहीं रहा और वो परंपराएं भी बीते दिनों की बात हो गई।

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