destruction himachal naati

हिमाचल दस्तक से विशेष बातचीत में बोले विद्यानंद सरैक

संस्कृति को लेकर सरकार चलाए अकादमी

शैलेश सैनी। नाहन
प्रदेश से हिमाचली नाटी का अस्तित्व नष्ट होता जा रहा है। नष्ट होती लोक संस्कृति व लोक रंग की विलुप्ति को लेकर संगीत नाटय अकादमी भारत सरकार से राष्ट्रीय अवॉर्ड विनर नाटी के महर्षि के नाम से विख्यात गीतकार, संगीतकार और गायक विद्यानंद सरैक बड़े आहत है। हिमाचल दस्तक से हुई विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि प्रदेश की लोक संस्कृति को यदि देव संस्कृति कहा जाए तो अतिशियोक्ति न होगी। प्रदेश के हर जिले में कुछ ही किलोमीटर दूर बाद भाषा के साथ-साथ खानपान सहित लोक संस्कृति भी अपने रंग में क्षेत्र को विशेष पहचान दिलाती है।

हिमाचल में आज बड़े-बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। नए-नए कलाकार उभर रहे हैं

विद्यानंद सरैक का कहना है कि हिमाचल में आज बड़े-बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। नए-नए कलाकार उभर रहे हैं। नए कलाकारों का उभरना अच्छी बात हैं, मगर लोक संस्कृति की विधाओं को जाने बगैर नाटी, गायन व वाद्यों से छेड़छाड़ करना लोक संस्कृति का सर्वनाश करना होगा। नई नाटियां जो बनाई जा रही है, उसमें न कथा है और न कथानक। अंतरा कहीं का है और पैरा कहीं पर जोड़ दिया जाता है। हिमाचल प्रदेश की लोक संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक बंसत से लेकर पतझड़ तक समस्त ऋतुओं को हमारी पुश्तैनी लोक परंपराओं ने एक वैज्ञानिक शोध देकर उसको लोक कला व संस्कृति में ढाला है।

नाटी की चार विधाएं हैं। आज की युवा पीढ़ी जो नाटी गायन करती है, उन्हें इन नाटी की विधाओं व स्वर और राग का कोई ज्ञान नहीं है। इन चार विधाओं में पहली आठ मात्रा की नाटी जिसको गिया या गायटी भी कहते हैं। जैसे गायन लय में पियूले ढाटूवे बोलो थियो हिजो माठुए यानि माठू कहता है कि तेरे पीले ढाटू ने मुझे बर्बाद कर दिया है। दूसरी विधा में 12 मात्रा की नाटी में ढाटू आली पार गांव धियाणे कोई चौढ़े मुये मेरे जिशु धाटा खिडिय़ा दिलड़ू मेरा जेश यानि मेरा दिल तुझ पर ऐसे गिर गया है, जैसे घी लुढ़क जाता है। साथ ही रथावला, ठोडा इसी राग व ताल पर आधारित है।

विद्या नंद सरैक की नाटी पर की गई रिसर्च की चौथी विधा तावली नाटी है

बिशू में यही ताल चलता है। तीसरी नाटी 16 मात्रा की है, जिसे ढीली नाटी भी कहा जाता है। इस नाटी में हल्का नृत्य, गायन व वादन को विलंब लय के साथ प्रस्तुत किया जाता है। ढाटू बिसरा लाणा, किसके चाले दाडिय़े मस्तुए यानि नायक नायिका से कहता है कि तू किधर जा रही है सज धज कर। तेरे माथे से जब ढाटू हटता है और उस पर जब तेरे माथे की बिंदिया नजर आती है तो सूरज भी फीका पड़ जाता है। विद्या नंद सरैक की नाटी पर की गई रिसर्च की चौथी विधा तावली नाटी है। यह छह मात्रा के आधार में बजती और गाई जाती है। इसी ताल में रासा नृत्य व गायन होता है।

इसी को यदि प्रेम रस में गाया जाए तो इस पर बना हुआ गाना भाभिए तेरे ढाटकू काला ओसो मेरे जियों रा रबाला यानि तेरा काला ढाटू मेरे दिल का बहलावा है। बहरहाल इसमें तो कोई शक नहीं है कि प्रदेश में नाटी, पहाड़ी गायन सहित उसका फिल्मांन भी हिमाचली संस्कृति से बिछुड़ता जा रहा है। जबकि नाटी की विधाओं स्वर व राग के सूत्रों को आज भी विद्यानंद सरैक जैसे हिमाचली लोक कलाकार ने संजोकर रखा है।

आज भी अस्सी वर्ष की उम्र में विद्यानंद सरैक के गले से जब पहाड़ी स्वर लहरियां निकलती हैं तो पहाड़ों सहित लोगों के खेत खलिहान व प्रेम रस में डूबने वाले प्रेमियों को सम्मोहित कर देती है। हिमाचल प्रदेश सरकार यदि हिमाचली संस्कृति को लेकर अकादमी चलाती है तो निश्चित ही हमारी विलुप्त होती देव संस्कृति और आहत होते विद्यानंद सरैक जैसे महार्षि प्रदेश को विश्व पटल पर हिमाचली टोपी जैसी पहचान भी देंगे।

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