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80 साल से एक परिवार का यही काम

  • एक बार खाने के बाद आते हैं बार-बार
  • छुट्टी के दिन उमड़ते काफी लोग

सोमी प्रकाश भुव्वेटा। चंबा
कुछ लोग अच्छा काम करके पैसा कमाते हैं , तो कुछ अच्छा काम करके नाम कमाते हैं। इसी से आगे जाकर उनकी पहचान बनती है। आज यहां ऐसे ही एक शख्स की बात करेंगे। छोटी सी दुकानदारी है पर प्रसिद्धि लोगों के दिलों पर राज करने जैसी। यूं तो इस शख्स की दुकान में मिठाइयां और कड़ी-बूर बनते हैं, लेकिन लोग इनके कड़ी-बूर को ज्यादा पसंद करते हैं। चंबा से चंद दूरी पर इनका ठिकाना है। एक बार इस दुकान में पहुंचकर कड़ी-बूर खाने वाले बार-बार इनके यहां खिंचे चले आते हैं।

बात यहां अस्सी साल से सरोल गांव में हलवाई की दुकान करने वाले एक परिवार की हो रही है। पहले इस दुकान में बैठकर खैहमती राम यह काम करते थे। अब इनके बेटे कुलदीप ठाकुर कड़ी-बूर बनाते हैं। रोजाना सुबह के वक्त ताजा सामान (कड़ी-बूर) तैयार करते है। शाम ढलते ही इनका सारा सामान बिक जाता है। कड़ी-बूर खाने के शौंकीन इनके पास जिले के अलग-अलग गांवों से पहुंचते हैं। खासकर, जिस दिन छुट्टी होती है।

लोग अपने परिवार के सदस्यों को विशेष तौर पर इनके पास कड़ी बूर खिलाने लाते हैं

उस दिन इनके यहां काफी भीड़ रहती है, क्योंकि कई लोग अपने परिवार के सदस्यों को विशेष तौर पर इनके पास कड़ी बूर खिलाने लाते हैं। कई बार नौबत ऐसी भी आती है जब दोपहर बाद ही इनके यहां बना कड़ी-बूर खत्म हो जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि कड़ी-बूर का जैसा टेस्ट पहले था। वही टेस्ट आज तक बरकरार है। मतलब क्वालिटी के साथ कोई भी समझौता इस परिवार ने नहीं किया। तभी तो अस्सी साल से बन रहे कड़ी-बूर को एक बार खाने वाले बार-बार इनके पास खिंचे चले आते हैं।

एक किस्सा भी इस परिवार के साथ जुड़ा है। बताया जाता है कि रियासतकाल के समय दीवान बहादुर ने खैहमती के हाथों बने आलू और कड़ी खाने पर उन्हें अपने यहां मोटी रकम पर नौकरी पर रखने की पेशकश की थी। लेकिन, खैहमती ने उनकी इस ऑफर को ठुकरा कर सरोल में ही हलवाई की दुकान करने की बात कही थी। अस्सी वर्ष से एक जैसे टेस्ट का कड़ी-बूर खिलाने का काम करने वाले इस परिवार का हर कोई मुरीद है।

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