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former chief secretary

सचिवालय के चक्कर काट रही विजिलेंस, रिकार्ड भी लिया

धारा 118 की मंजूरी के बदले रिश्वत लेने की है रिकार्डिंग

हिमाचल दस्तक ब्यूरो। शिमला
राज्य के एक पूर्व मुख्य सचिव पर गिरफ्तारी का खतरा मंडरा रहा है। विजिलेंस की टीमें आजकल सचिवालय के चक्कर काट रही हैं और वीरवार को जांच एजेंसी ने कार्मिक विभाग की ब्रांच से संबंधित अफसर का उस वक्त का रिकार्ड लिया, जब वह राजस्व विभाग में सचिव और एफसीआर थे। ये धारा 118 की अनुमति के बदले रिश्वत लेने की एक रिकार्डिंग का केस है, जो रिकार्डिंग पूर्व भाजपा सरकार के समय विजिलेंस ने ही की थी। इस मामले में संबंधित पूर्व मुख्य सचिव आरोपी के तौर पर अभी एफआईआर में शामिल नहीं है।

पूर्व कांग्रेस सरकार में खुद गृह सचिव रहते हुए इन्होंने विजिलेंस से केस की क्लोजर रिपोर्ट भी जमा करवा दी थी, लेकिन कोर्ट ने जुलाई 2018 में इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए आगे जांच करने के आदेश दिये हैं। स्पेशल जज ने एजेंसी से पूछा था कि जब केस में आरोपी कारोबारियों के बयान दर्ज हैं, फोन टैपिंग का रिकार्ड है, रिश्वत मांगने की कन्वरसेशन है तो फिर संबंधित सरकारी अफसरों से पूछताछ क्यों नहीं की गई? इसके बाद मुख्य सचिव और गृह सचिव की अनुमति से जांच फिर खुली।

विजिलेंस ने संबंधित पूर्व मुख्य सचिव को इसी संबंध में एक प्रश्नावली भी भेजी थी। जांच एजेंसी के सूत्र कहते हैं कि अफसर ने इसका जवाब नहीं दिया। चूंकि रिकार्डिंग से मिलान के लिए वायस सैंपल जरूरी है, इसलिए अब कस्टडी चाहिए। सीआरपीसी में हुए संशोधन के बाद अब वायस सैंपल कस्टडी में ही लिया जा सकता है। इसलिए गिरफ्तारी का आधार स्पष्ट करने के लिए विजिलेंस अफसर खूब दौड़ भाग कर
रहे हैं।

सात साल पुरानी है ये एफआईआर

मामला वर्ष 2011 का है। तब संबंधित पूर्व मुख्य सचिव राजस्व विभाग के प्रधान सचिव थे। धारा 118 की मंजूरी से संबंधित एक केस में इनके खिलाफ रिश्वत मांगने की शिकायत किसी कारोबारी से मिली। केस परवाणू और पंचकूला के दो कारोबारियों से संबंधित था। विजिलेेंस ने इस शिकायत पर ट्रैप लगाया और पूर्व मुख्य सचिव समेत एक अन्य वन अफसर की बातचीत रिकार्ड हो गई। तब विजिलेंस के एएसपी विमुक्त रंजन थे। एजेंसी ने तय किया कि कॉल रिकार्ड के अनुसार पैसे के लेन देन पर छापा मारकर रंगे हाथ पकड़ा जाए।

लेकिन किन्हीं कारणों से लास्ट मिनट पर पूरे मिशन को अबॉर्ट कर दिया गया। बाद में विजिलेंस ने 21 मार्च 2011 को भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 8 में ये केस एफआईआर नंबर 7/2011 में दर्ज किया। केस में दोनों कारोबारियों के बयान लिये गए। लेकिन 2012 में कांग्रेस सरकार के गठन के बाद केस को ठंडा कर दिया गया और प्रधान सचिव रेवन्यू इसी सरकार में पहले गृह सचिव और फिर मुख्य सचिव बने।

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