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former cm virbhadra singh

प्रदेशाध्यक्ष के बयान से ओबीसी नेतृत्व में आई दरार

जलवा नहीं दिखा पाई कांग्रेस की फौज

जमीनी जंग

उदयबीर पठानिया

चार दिन तक वीरभद्र सिंह कांगड़ा-चंबा प्रवास के बाद लौटने की तैयारी में हैं। इन चार दिनों में उन्होंने पवन काजल की हवा बनाने के लिए दोनों जिलों में राजा ने जबरदस्त कदमताल तो की, लेकिन उनकी फौज कोई खास जलवा नहीं दिखा पाई। आलम कमोबेश यही रहा कि फौज दो कदम आगे-दो कदम पीछे होकर उसी जगह खड़ी रही जिस जगह वीरभद्र सिंह के मैदान में उतरने से पहले खड़ी थी। वीरभद्र सिंह कांगड़ा से चंबा के लिए निकले तो ओबीसी समुदाय के ही नेता चौधरी चंद्र कुमार ने मोर्चा खोल दिया। चौधरी ने अपने बेटे नीरज चौधरी पर हुए हमले के लिए कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर को कटघरे में खड़ा कर दिया।

वजह थी राठौर का वो बयान जिसमें उन्होंने यह कहा था कि नीरज कांग्रेस के सदस्य ही नहीं हैं। पुत्र प्रेम में चंद्र कुमार सूरज की तरह इतने गरमाए कि उन्होंने कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष राठौर को झुलसाने का कोई मौका नहीं गंवाया। साफ कह दिया कि राठौर किसी के बहकावे में आकर छींटाकशी न करें।

गौरतलब है कि इस विवाद की जड़ को कांगड़ा के कांग्रेसी तबके की ही देन माना जा रहा है। याद रहे कि खुद नीरज भारती ने यह कहा था कि कांगड़ा के एक नेता ने उनकी मेंबरशिप के बाबत सवाल करवाया था और इसका जवाब भी राठौर के कानों में उन्हीं नेता ने पहुंचाया था। इस वजह से अब कांग्रेस की रणनीति कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में उलझकर रह गई है। एक ओबीसी नेता यानि काजल मैदान में हैं तो दूसरे ओबीसी नेता चंद्र कुमार एंड सन नाराज हो गए हैं। जाहिर है कि इस कवायद से ओबीसी समुदाय में भी उहापोह का माहौल बन गया है। जबकि खास बात यह भी है कि इस घटनाक्रम से पहले चंद्र कुमार ने काजल के सारथी बनने का काम शुरू कर दिया था। पर एक सवाल के बवाल ने कांग्रेस के अंदर भूकंप के हालात बना दिए हैं। जबकि यह भी हकीकत है कि कांगड़ा जिला में ओबीसी वोट बैंक खूब मजबूत है। पर अब इस बैंक की तिजोरी में भी दरारें उभर आईं हैं।

पहली दफा ऐसा हुआ कि वीरभद्र सिंह की जिले में मौजूदगी के बावजूद मजबूती या एकजुटता की बजाए मोरचे खुले। जीएस बाली ने मैदान में कदम तो जरूर उतारे पर खामोशी का दामन नहीं छोड़ा है। पुराने कांग्रेसी नेता रहे मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने भी टाइमिंग का पूरा फायदा उठाते हुए यह कह दिया कि काजल को बलि का बकरा बनाया गया है।

वीरभद्र सिंह के चार दिन के दौरे में यह बात तो खुलकर सामने आई कि उन्होंने काजल के लिए संजीवनी का बंदोबस्त बखूबी किया। पर यह सवाल भी इसी तथ्य के बराबर है कि जितनी संजीवनी उन्होंने दी, उतने ही वार अपनों की तरफ से अपनों पर ही हो गए। नेताओं की एक-दूसरे के खिलाफ सरेआम हुई हरकतों ने यह भी साफ कर दिया कि भाजपा के साथ स्कोर सेटल करने की बजाए आपस में स्कोर सेटल किया गया। कांग्रेस की आंखों का काजल बने पवन की आंखों के सामने आपसी टस्सल का अंधड़ खड़ा हो चुका है। चंबा-कांगड़ा की जनसभाओं में भी जमीनी हकीकत शामियानों के तले पड़ी खाली जमीन दिखा गई। हकीकत में तो फिलवक्त प्रचार-प्रसार की बजाए कांग्रेस में विवाद ही आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं।

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