trout hunting

प्रजनन काल के चलते प्रदेश भर में आखेट पर पूर्ण प्रतिबंध

निगरानी के लिए उडऩदस्तों की तैनाती

हिमाचल दस्तक। कुल्लू 

प्रदेश में फरवरी 2017 तक ट्राउट आखेट पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लग गया है। इस दौरान कोई आखेटक ट्राउट का शिकार करते पकड़ा गया तो उसके खिलाफ प्रदेश फिशरी एक्ट 1976 के तहत कार्रवाई की जाएगी। नवंबर से फरवरी के महीनों में ट्राउट का प्रजनन काल रहता है। इसमें मछली नदी-नालों में ऐसा स्थान प्रजनन के लिए चुनाव करती हैं जहां पर प्रजनन पूर्ण रूप से सुरक्षित हो और अंडों का सही रूप से निशेचन हो सके।

मत्स्य विभाग नदी-नालों में ट्राउट की बढ़ती संख्या के लिए भी इन चार महीनों में पूर्ण रूप से आखेटकों को शिकार करने से रोकती है। क्योंकि मछली के प्रजनन काल में ही नदी-नालों में उनके प्रजनन को सफल करने के लिए आखेट पर प्रतिबंध लगाती है। मत्स्य विभाग व प्रदेश सरकार हर वर्ष इन चारों महीनों में नदी नालों में पाई जाने वाली ट्राउट के संरक्षण के लिए आखेट पर रोक लगा देती है।

निदेशक मत्स्य विभाग एसपी मेहता ने बताया कि विभाग का ट्राउट के माध्यम से पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए यह कदम उठाया जाता है ताकि गर्मी के मौसम में यहां आने वाला देश-विदेश का सैलानी जो मत्स्य आखेट का शौक रखता है वह नदी नालों में ट्राउट आखेट का लुत्फ ले सके।

ट्राउट मछली के लिए हमेशा निरंतर व स्वच्छ जल की आवश्कता रहती है

हिमालयन एंगलिंग एसोसिएशन के महासचिव केबी रलहान ने बताया कि प्राकृतिक रूप से होने वाले प्रजनन से नदी नालों में ट्राउट की संख्या में तो वृद्धि होती है क्योंकि इस दौरान नदी-नालों का पानी बिलकुल स्वच्छ होता है। ट्राउट मछली के लिए हमेशा निरंतर व स्वच्छ जल की आवश्कता रहती है।

इन महीनों में ट्राउट मछली के लिए प्राकृतिक रूप से होने वाले प्रजनन को वांछित तापमान मिलता है तथा पानी की स्वच्छता व बहता पानी इसके इस कार्य में प्रजनन प्रक्रिया को सक्षम बनाता है। कृत्रिम प्रजनन प्रक्रिया के लिए 12 से 15 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता रहती है और विभाग हर वर्ष करीब ट्राउट की कृत्रिम प्रजनन प्रक्रिया से तीन लाख से अधिक अंडों का उत्पादन करता है।

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