हिमाचल दस्तक। रमेश सिद्धू

बुधवार की शाम करीब 3000 करोड़ से अधिक के सेब कारोबार से जुड़े बागवानों के लिए एक राहत भरी खबर लेकर आई। विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान बागवानी मंत्री महेंद्र ठाकुर द्वारा अगले सीजन से सेब की पैकिंग के लिए सिर्फ यूनिवर्सल कार्टन का इस्तेमाल किए जाने की घोषणा से लाखों बागवानों के चेहरे खिल उठे।

पिछले करीब 25-30 वर्षों से आढ़तियों और लदानियों की लूट का शिकार हो रहे बागवानों को हर साल हो रहे नुकसान से निजात और अपनी फसल की सही कीमत मिलने की उम्मीद बंधी है। 90 के दशक की शुरुआत तक सेब की पैकिंग के लिए लकड़ी की पेटियां चलन में थीं और उसमें भी करीब 20 से 22 किलो तक ही सेब आता था। लेकिन टेलीस्कोपिक कार्टन के चलन में आने के बाद से बागवान लगातार नुकसान उठाने को मजबूर हैं।

दरअसल, टेलीस्कोपिक कार्टन 3-3 प्लाई के दो भागों में आता है और इसमें अपनी मर्जी के हिसाब से पैकिंग की जा सकती है। इसी का फायदा उठाते हुए आढ़ती और लदानी बागवानों को एक बॉक्स में क्षमता से ज्यादा यानी एक ट्रे अतिरिक्त लगाने को मजबूर करते हैं। साधारण भाषा में यूं समझिए कि एक बॉक्स में कायदे से सेब की चार तहें लगनी चाहिए। लेकिन आढ़ती इस प्रकार भरी पेटी को बेचने से ही इनकार कर देते हैं।

मजबूरन बागवानों को एक अतिरिक्त तह लगानी पड़ती है जिसके उन्हें थोड़े ज्यादा पैसे मिल जाते हैं। लेकिन सेब खरीदने वाले यानी लदानी जब उसी सेब को आगे बेचते हैं तो फिर से बॉक्स चार तहों का हो जाता है। सीधे-सीधे चार बॉक्स से एक-एक तह निकालकर एक अतिरिक्त बॉक्स तैयार हो जाता है। यानी 100 बॉक्स के 125 बॉक्स बन जाते हैं।

सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि अभी प्रतिवर्ष 5 करोड़ बॉक्स सेब मार्केट में जाता है तो आढ़तियों और लदानियों का यह खेल उत्पादकों को कितनी चपत लगा रहा है। बहरहाल बागवानी मंत्री द्वारा विधानसभा में कही गई यह बात उम्मीद जगाने वाली तो है, लेकिन उम्मीद पूरी करने वाली तभी साबित होगी जब इसे अमलीजामा भी पहनाया जाए।

इससे पहले 2013 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समय मुख्यमंत्री ने बाकायदा बजट भाषण में यूनिवर्सल कार्टन का इस्तेमाल किए जाने का एलान किया था, लेकिन सेब सीजन आते-आते निर्णय वापस ले लिया गया। फिलहाल उम्मीद कर सकते हैं, इस बार यह कवायद सिर्फ ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का जवाब देने तक सीमित न रहकर धरातल पर भी उतरेगी।

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