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एक सुरक्षाचक्र कायम होना जिसमें प्रत्येक वोटर की भागीदारी लाजिमी

आज लोकतंत्र का पर्व है। पांच साल में एक बार आने वाला। हमारे क्षेत्र का, हमारे प्रदेश का मुस्तकबिल चुनने का पर्व। वोट की ताकत के जरिये एक मजबूत पहाड़ खड़ा करने की जरूरत है, तभी अगले पांच साल वहां से विकास के सोते फूटेंगे। आज हमें तय करना होता है कि अपने विधानसभा क्षेत्र को मैं किसके हवाले करने जा रहा हूं। एक सुरक्षाचक्र भी कायम होना है जिसमें प्रत्येक वोटर की भागीदारी लाजिमी है। एक भी वोटर का छूटना, कहीं न कहीं उस सुरक्षाचक्र को कमजोर करने के मानिंद होगा।

कौन सरकार में हमारा प्रतिनिधि होगा, इसका चुनाव कोई मामूली बात नहीं है। सो इस आयोजन में हर हालत में शामिल होना ही है। अच्छी बात यह है कि हिमाचल प्रदेश के मतदाता की परिपक्वता हर चुनाव में बराबर देखने को मिल रही है। हिमाचल का वोटर समझने लगा है कि मत का दान करने जैसी बात नहीं है। यह वह यज्ञ है जिसमें उसकी आहुति डले बिना बात नहीं बनेगी। उसने इसे मताधिकार की भावना से भी आगे बढ़कर जिम्मेदारी की भावना के हिसाब से समझने की कोशिश की है।

पहाड़ में लोकतंत्र की मजबूती का आधार

यही वजह है कि 2012 में रिकॉर्ड 75 फीसदी वोटिंग हुई थीं। लोकतंत्र की जीत और खूबसूरती इसी में है कि इस बार हिमाचल के मतदाता एक नया रिकॉर्ड बनाएं। बूथ पर लंबी लाइनें लगें जो इस पर्व के प्रति हमारे उल्लास का प्रतीक होंगी। पहाड़ में लोकतंत्र की मजबूती का आधार है हमारी आधी दुनिया। महिला शक्ति यहां वोटिंग में पुरुषों से भी आगे रहती है। इस बार भी यही जज्बा बनाए रखने की जरूरत है। युवा जोश से लबरेज करीब सवा लाख नए मतदाताओं में भी उत्साह भरना होगा।

बहरहाल हम न केवल उत्साह से वोटिंग करें बल्कि अच्छे और कर्मठ लोगों को चुनें। इससे पार्टियों पर भी दबाव बढ़ेगा। उन्हें अगले चुनाव में और अच्छे लोगों को टिकट देना पड़ेगा। इससे हमारा लोकतंत्र और ज्यादा निखरेगा। यदि हम इसे छुट्टी का दिन मान लेंगे या फिर यह मान लेंगे कि एक वोट से क्या फर्क पड़ेगा तो समझ लें कि हम जिम्मेदार नागरिक नहीं हैं। – संपादक

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