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एक दशक पहले रोजगार के लिए इधर-उधर भटकते थे लोग, अब दे रहे रोजगार

ग्रीन गोल्ड परियोजना ने बदली रमेश की तकदीर

सोमी प्रकाश भुव्वेटा। चंबा
आजकल हर कोई रोजगार के लिए यहां-वहां भटक रहा है। लेकिन जिले का एक ऐसा एरिया भी है जहां के लोगों ने स्वरोजगार को अपना कर अपने एरिया को इस कदर संवार दिया है कि अब यहां के लोग अन्य एरिया के लोगों को रोजगार मुहैया करवा रहे हैं। सलूणी खंड के इस एरिया के लोगों ने रोजगार के लिए भटकने की बजाय अपने एरिया की बंजर जमीन को इस तरह से उपजाऊ बना दिया है कि अब उनकी जमीन जैसे सचमुच सोना उगलने लगी है। आज यहां जिस एरिया का जिक्र किया जा रहा है।

उस एरिया के लोग एक दशक पहले रोजगार के लिए यहां-वहां भटकते थे। आज उस एरिया के लोग अन्य एरिया के बेरोजगारों को रोजगार मुहैया करवाने में अगर सक्षम हैं तो इसका पूरा श्रेय इलाके के युवा किसान रमेश सिंह वर्मा को जाता है। क्योंकि, इन्होंने ही अपने एरिया में खेती-बाड़ी की संभावना को देखते हुए सरकारी नौकरी का मोह त्याग कर सिर्फ खेती-बाड़ी करनी शुरू की थी। इन्होंने शिमला मिर्च, टमाटर, फूल, गोभी, बंद गोभी, मटर और आलू से शुरुआत की थी।

खेतीबाड़ी छोड़ चुके लोगों ने भी अपने जमीन पर खेती करनी शुरू कर दी

अब सेब की ऐसी किस्म इलाके में तैयार करने वाले हैं। जिसकी तीसरे साल में फसल हो जाती है। रमेश सिंह वर्मा के खेतीबाड़ी से जुडऩे की कहानी भी बड़ी रोचक हैं। इनके मुताबिक अगर सरकार ग्रीन गोल्ड परियोजना न लाती तो वह आज भी रोजगार के लिए यहां-वहां भटक रहे होते। रमेश सिंह वर्मा बताते हैं कि सच कहें तो उस वक्त सलूणी ब्लाक के बीडीओ रहे राम प्रसाद और डीआरडीए के प्रोजेक्ट आफिसर एचआर राणा को कभी नहीं भूल सकते। क्योंकि डियूर समेत आसपास के लोगों के लिए दोनों अफसर उस वक्त मसीहा की तरह बनकर पहुंचे।

उस समय यहां की जनता पाई-पाई को मोहताज हुआ करती थी और लोग रोजगार के लिए तरस रहे थे। वक्त की नजाकत को देखते हुए दोनों अधिकारियों के प्रोत्साहन के कारण ही डियूर और आसपास के एरिया की जनता खेती-बाड़ी की तरफ सही मायने में जुड़ पाई है। अब तो कृषि विभाग और उद्यान विभाग के अधिकारियों का भी डियूर की ओर आकर्षण बढ़ा है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि एक दशक पहले डियूर के युवा रोजगार के लिए जिले से बाहर ही रहते थे। पर जबसे अपने एरिया में अच्छी खेती-बाड़ी होने लगी है तो खेतीबाड़ी छोड़ चुके लोगों ने भी अपने जमीन पर खेती करनी शुरू कर दी है। इलाके में खेती-बाड़ी से जुड़े लोगों की संंख्या का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां पर 1700 क्विंटल मटर और 2300 क्विंटल आलू के बीज की खपत होती है। खेती-बाड़ी को स्वरोजगार के तौर पर अपनाकर यहां के लोग काफी खुश है।

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