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दूर-दूर से आते हैं लोग, खड़कांह गांव के 60 परिवार आज भी करते हैं शाकाहारी भोजन

चंद्र ठाकुर। नाहन
आधुनिकता के इस दौर में भी सांचा विद्या व पाबूची लिपी की 350 पांडूलीपियों का अध्ययन कर आज भी याचक को फलादेश बताया जाता है। पाबूची विद्या ज्योतिष के माध्यम से किसी जातक के भविष्य निर्माण व कुंडली निर्माण संबंधि फलादेश व नक्षत्रों को अध्ययन करने की विद्या है। इनमें जन्म के समय, स्थान व अक्षांश निकाले जाते हैं। इसके बाद विशोतरी महादशा व योगनी महादशा निकाली जाती है। इसके बाद नवांश चक्र का निर्माण होता है। इन सब का निर्माण करने के बाद एक रमन या जिसे सांचा कहते हैं। उसके द्वारा फलादेश बताया जाता है।

प्रश्न पूछने के लिए अलग ढंग का प्रयोग किया जाता हैsacha vidhaya

यह शेर के दांत अथवा बारह सिंगा के सिंग से निर्मित होता है, यह चार कौनों वाला होता है। चारों कौनों पर अलग-अलग संख्याओं में अंक खुदे होते हैं। इस रमन को मृगशाला के ऊपर रखा जाता है। इससे फलादेश की गणना की जाती है। प्रश्न पूछने के लिए अलग ढंग का प्रयोग किया जाता है। लकड़ी की बेदी पर मंदिर की मिट्टी डाली जाती है। उस पर सांचे का आकर कुरेदते हैं। इससे धरेवट विधि से ज्योतिष गणना की जाती है। इससे देव दोष, पितृ दोष, तांत्रिक गतिविधियों के बारे में पता लाकर उनका सात्विक विधि से उपाय बताए जाते हैं।

सिरमौर जिला के शिलाई विकास खंड की शखोली पंचायत के खड़कांह गांव में पाबूच ब्राह्मणाों के 60 परिवार आज भी सांचा विद्या व पाबूची लिपी की 350 पांडूलीपियों का अध्ययन कर लोगों को फलादेश बताते हैं। इस गांव के ब्राह्मणों की खासियत यह है कि यहां का कोई भी व्यक्ति मांसाहारी भोजन का सेवन नहीं करता। शराब पीना भी मना है, गांव में नशे की सभी वस्तुएं निषेध हैं। बाहर से भी कोई व्यक्ति गांव में इन आसाध्य वस्तुओं को लेकर प्रवेश नहीं कर सकता। यहां तक की सिगरेट व तंबाकू का प्रयोग करना भी मना है। इस गांव के सभी ब्राह्मण पंथ ऋषि की औलाद हैं। ये विष्णु के उपासक हैं। ग्राम देवता के रूप में लोग महासू देवता की पूजा करते हैं।

कहां-कहां से आते हैं लोगsacha vidhaya1

इस विद्या से फलादेश जानने, जन्म पत्री निर्माण, तांत्रिक गतिविधियों व अन्य क्रियाक्लापों को जानने के लिए पूरे उत्तर भारत से लोग इन ब्राह्मणों के पास अपना भविष्य फल जानने के लिए आते हैं। इनमें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली व मध्यप्रदेश के लोग अधिक संख्या में आते हैं। यहां तक की कई बार पुलिस भी चोरी की बड़ी-बड़ी घटनाओं को सुलझाने के लिए पाबूची विद्या का सहारा लेते हैं। इनकी खासियत यह है कि चाहे कोई कितना ही बड़ा धनवान या गरीब, सभी को मात्र सवा पांच रुपये सांचें में रखने होते हैं। यही मात्र इन लोगों की दक्षणा होती है, अपनी श्रद्धा से कोई कुछ दे जाए, वह अलग बात है।

नहीं करते बाहर भोजन

खड़कांह के निवासी विष्णु के उपासक होने के चलते शुद्ध शाकाहारी हैं। गांव का कोई भी व्यक्ति बाहर भोजन नहीं करता। यहां तक की इस गांव के लोग अगर कहीं बाहर जाते हैं तो वह स्वयं अपना भोजन बनाते हैं। किसी के हाथ का बना हुआ भोजन नहीं खाते। न ही किसी होटल या रेस्तरां में खाना खाना भी निषेध है। वीरवार के दिन सभी लोग मिठा भोजन ही करते हैं। इस दिन नमक खाना निषेध है। इनकी शादी-विवाह में भी मांसाहारी भोजन नहीं बनता।

ढंग से नहीं हो रहा पाबूची लिपी का संरक्षण

नाहन के श्रीजगन्नाथ मंदिर के पुजारी पंडित नरेश पाबूच का कहना है कि उनकी पाबूची विद्या को संरक्षित करने के लिए सरकार गंभीर प्रयास नहीं कर रही है। हालांकि भाषा एवं संस्कृति विभाग ने कई बार कार्यशाला लगाकर इसकी जानकारी देने की कोशिश की है। मगर सीमित वित्तीय साधन होने के कारण इस विद्या को प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने बताया कि यदि इस विद्या को संरक्षित किया जाए, तो ज्योतिष व संस्कृत के विद्धानों केलिए यह बहुत सहायक सिद्ध होगा।vidhya

क्या है इनका इतिहास

खड़कांह गांव में संवत 1157 में राजस्थान के जैसलमेर से यह पाबूच पंडित स्वर्गीय सिरमौर के महाराजा ढाकेंद्र प्रकाश के जन्म पर यह लोग रानी के साथ आए थे। सिरमौर रियासत के राजा ने इन ब्राह्मणों को दूर-दराज के क्षेत्र खड़कांह में बसाया। इसका कारण यह था कि यह लोग शांति प्रिय व एकांत में रहकर ज्योतिष विद्या का अध्ययन व फलादेश संहिता का निर्माण पहाड़ी भाषा में करना चाहते थे। इसके लिए राजा ने रियासत के कुछ काबिल विद्धानों को उनके साथ भेजा। पीढ़ी दर पीढ़ी यह ज्योतिष के ग्रंथों की रचना करते गए। इन्होंने पाबूची शैली में लगभग 400 ज्योतिष व प्रश्नावली संबंधि ग्रंथ तैयार किए। इनमें से आज 350 के करीब पांडूलीपियां इन लोगों के पास सुरक्षित हैं।

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