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पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के दौरों से दूर रह रहे हैं उनके समर्थक

लीडरशिप की गेम चेंज में कौन आलाकमान की पसंद?

रविंद्र चंदेल। हमीरपुर
इसे कांग्रेस के नेतृत्व परिवर्तन का दौर मानें या लीडरशिप की स्पर्धा का परिणाम कि अब पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के दौरों से उनके कट्टर माने जाने वाले समर्थक भी अब कन्नी काटने में लगे हैं। जी हां, हमीरपुर में हुए वीरभद्र सिंह के दो दौरों के दौरान कम से कम यही देखने को मिला है। पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के जो समर्थक जिला के तोरणद्वार उखली में फूल हारों के साथ कभी घंटों पहले पहुंचकर पहले पहुंचकर अपने आपको सौभाग्यशाली मानते थे। वही कट्टर समर्थक वीरभद्र सिंह के इन दौरों में पूरी तरह नदारद पाए गए।

सत्ता और पार्टी के कई बिगड़ते बनते समीकरणों के बीच 1983 से लेकर 2017 तक यकीनन कांग्रेस में वीरभद्र सिंह का एक सत्र राज रहा है और यह भी यकीनी तौर पर माना जा सकता है कि वीरभद्र सिंह से बड़ा सियासी कद अभी तक कम से कम कांग्रेस में कोई नहीं है। वीरभद्र सिंह की बतौर मुख्यमंत्री व नेता जनता व कार्यकर्ताओं में स्वीकार्यता का अभी तक कोई शानी नहीं है, लेकिन यह भी सही है कि नेतृत्व परिवर्तन के दौर में जबरदस्त संघर्ष के बीच उनकी उम्र्र साथ नहीं दे रही है।

तमाम नेता करीब-करीब एक जैसे समान दर्जे की हैसियत रखते हैं

बेशक वह अभी तक ऐलान कर रहे हैं कि उनमें 25 वाला जोश और जनून अभी बाकी है। वीरभद्र सिंह के बाद प्रदेश के किसी भी कांग्रेस नेता को एक, दो, तीन, चार दर्जों की श्रेणी में नहीं बांटा जा सकता है। तमाम नेता करीब-करीब एक जैसे समान दर्जे की हैसियत रखते हैं। जानकार बताते हैं कि कांग्रेस के बीच चल रहे इस संघर्ष को लेकर कांग्रेस आलाकमान के प्रयास हैं कि हिमाचल में कांग्रेस की अगली लीडरशिप उनकी पसंद की हो, जबकि वीरभद्र सिंह इस संघर्ष में उम्र के इस पड़ाव पर संघर्षरत हैं कि प्रदेश कांग्रेस की अगली लीडरशिप उनकी पसंद की हो।

बस, इसी स्पर्धा के बीच खुद का अस्तित्व बचाएं व बनाए रखने की फिराक में हमीरपुर के कांग्रेसी नेता वीरभद्र सिंह से दूरी बनाने लगे हैं। जिला के इका-दुक्का कांग्रेसी नेता व वीरभद्र सिंह के समर्थकों को छोड़ दिया जाए, तो बाकि तमाम समर्थकों की फौज सिंह के हमीरपुर दौरों से नदारद रही। अब यह सोचने वाली बात है कि जो अपने तमाम कामों को छोड़कर वीरभद्र के स्वागत के लिए होड़ में रहते थे वह घर में होने के बावजूद वीरभद्र सिंह के स्वागत के लिए क्यों नहीं पहुंचे।

कुछ कांग्रेसी नेताओं से जब इस मामले पर बात की तो उन्होंने कहा कि पार्टी को हमीरपुर में मजबूत करने के लिए वीरभद्र सिंह का एक कदम तो सही था, लेकिन दूसरा कदम भी अगर उसी नेता के पुत्र की तरफ मजबूती के नाम पर बढ़ रहा है, तो ताउम्र कांग्रेस से वफादारियां व फरमावदारियां निभाने के बावजूद कांग्रेस नेता उम्र के इस पड़ाव पर बेटे का थैला उठाने की जलालत के बजाय घर बैठना ठीक समझेंगे।

शायद यही एक बड़ा कारण है कि हमीरपुर में वीरभद्र के जो समर्थक उनके इशारे पर जान देने पर तैयार रहते थे। अब वह उनके सियासी साए से भी कतराने लगे हैं, तो क्या सच में ही प्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन का दौर चल निकला है?

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