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BJP and Congress

एक इशारे से भड़के शरारे, पूर्व कद्दावर ओबीसी नेता चौ. सरवण कुमार के बेटे विक्रम निकले बाहर

डाटा ढूंढने और जिम्मेदारियां तय करने निकली थी कांग्रेस

हिमाचल दस्तक। उदयबीर पठानिया

ओबीसी आजाद उम्मीदवार राकेश चौधरी की आंच से झुलस रही बीजेपी-कांग्रेस को उम्मीद थी कि शायद वीरवार को वह नामांकन वापस ले लें। पर नामांकन तो वापस नहीं हुआ, उलटा कांग्रेस विवाद में फंस गई। वीरवार को कांग्रेस ने जिम्मेदारियां बांटने के लिए बैठक बुलाई हुई थी। धर्मशाला के साथ लगते एक नामी होटल में बैठक शुरू होने को ही थी कि अचानक एक फरमान जारी हुआ कि वही लोग बैठक का हिस्सा बनें, जिनको बैठक में आने का फोन किया गया है।

इस ऐलान के साथ ही ऐसा दृश्य बना कि सब भौचक हो गए। बैठक में स्थानीय और कांग्रेस अन्य पिछड़ा वर्ग विभाग के प्रदेश उपाध्यक्ष विक्रम चौधरी भी मौजूद थे। उन्होंने तुरंत सीट छोड़ी और बाहर का रास्ता पकड़ लिया। उनको उठता देख किसी भी नेता ने उनको रोकने की जहमत नहीं उठाई। हैरानी की बात यह है कि विक्रम चौधरी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और कद्दावर ओबीसी नेता रहे स्व. चौधरी श्रवण कुमार के बेटे हैं। विक्रम से जब इस बाबत बात कि तो उन्होंने कहा कि मुझे बैठक की जानकारी मिली थी, तो मैं बैठक में बतौर कार्यकर्ता और पदाधिकारी होने के नाते गया था।

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मुझे कोई टेलीफोन नहीं आया था। मगर अंदर जब बिना टेलीफोन आने वालों को बाहर जाने को कहा तो मैं निकल आया। दुख तब हुआ जब कांग्रेस के एक भी नेता ने भूल सुधार नहीं किया और मुझे अपमानित किया गया। खैर, अब इसका सियासी नतीजा जो भी हो,पर कांग्रेस के हिस्से में यह नया विवाद जुड़ गया। वहीं कांग्रेस के आला नेताओं को जब इस बाबत उनका पक्ष रखने के लिए फोन किया गया तो उन्होंने फोन ही पिक नहीं किए।

अलबत्ता ओबीसी सैल के प्रदेश महामंत्री चौधरी हरभजन सिंह भज्जी ने घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए कहा कि बिना फोन आए कुछ लोगों को बाहर जाने को जरूर कहा गया था। गलतफहमी में ऐसा हुआ और विक्रम बाहर निकल गए। भज्जी ने कहा कि विक्रम से बात करके मामला सुलटा लिया जाएगा। अब यह चूक भूलवश हुई या फिर किसी रणनीति के तहत इसका कोई जवाब नहीं मिल रहा। वीरवार देर रात तक कांग्रेस की बैठक में हुए हंगामे की खबरें माहौल को गरमाती रहीं।

कौन थे चौधरी सरवण कुमार…

स्व. चौधरी साहब ओबीसी समुदाय में बाबा भीमराव अंबेडकर की तरह माने जाते हैं। इन्होंने ही हिमाचल प्रदेश लैंड एंड टेंडेंसी एक्ट 1971, जिसे मुजारा एक्ट के नाम से जाना जाता है,को ड्राफ्ट किया था। इसकी वजह से ही ओबीसी बिरादरी को जमीनें मिली थीं।

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भाजपा का पॉलिटिकल टूरिज्म स्टेशन बना धर्मशाला

शुरुआती दौड़ में पिछड़ गई भाजपा की टीम, बागी राकेश को मनाने में पिट गई हिट नेताओं की जमात

तीन अक्तूबर का सूरज ढलते ही भाजपा सरकार के चमचमाते चेहरों भी ढल गए। अपनी ही पार्टी के बागी राकेश चौधरी को मनाने में सब मंत्री पिट गए। सरकार में जातीय समीकरणों के आधार पर फिट हुए कांगड़ा के नेताओं की जमात नामांकन वापस लेने की अंतिम घड़ी तक कोई ऐसा जलवा नहीं दिखा पाए, जिससे सरकारी जलवे हिट नजर आते। राकेश चौधरी ने नामांकन वापस नहीं लिया और बड़े-बड़े हीरो पिटे हुए साबित हो गए। दरअसल, इस सरकारी पर्दे पर चलने वाली फिल्म के तमाम नायक-नायिकाएं उपचुनाव के ट्रेलर में अभी तक सिर्फ साइड रोल ही करते साबित हो रहे हैं।

पूरा उपचुनाव, खासकर पार्टी लाइन की जगह कास्ट फैक्टर पर सिमट गया है। न तो इस डैमेज कंट्रोल को कांगड़ा में ओबीसी समुदाय से सियासत चमकाने वाले नेता संभाल पाए और न ही अन्य समुदायों भाजपाई नेता। अब नए समीकरणों में सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि भविष्य में भाजपा का हश्र क्या रहेगा ? ओबीसी नाराज हैं तो ब्राह्मण भी भगवान परशुराम की तरह क्रोधित हो चुके हैं। कुल पंद्रह विधानसभा सीटों वाला कांगड़ा जिला ऐसा है,जिससे शिमला की विधानसभा का रास्ता बनता है। ब्राह्मणों की जमात प्रचंड तेवर दिखा रही है। हैरानी की बात यह है कि तमाम तबके भाजपा को सहन करने के मूड में नहीं हैं। सरकार ने जिन नेताओं को लाज बचाने का काज दिया हुआ है,उनकी तरफ से कोई ऐसा सबूत नहीं है कि वह आसानी से लाज बचा लेंगे।

ऐसे में जाहिर सी बात है कि बीते विधानसभा चुनावों मर कांगड़ा-चंबा में एक भी टिकट किसी ब्राह्मण को न देने के इल्जाम से जूझ रही भाजपा पर अब ओबीसी विरोधी होने का ठपा लग गया है। जो मैनेजर हैं,वह कुछ भी मैनेज करने में नाकामयाब साबित हो गए हैं। भाजपा काडर भी साफ कह रहा है कि जो लोग एक बागी को नहीं मना पाए, वह वोटर को कैसे पटाएंगे? हार्डकोर काडर तो यहां तक कह रहा है कि धर्मशाला में कोई सियासी कार्यशाला काम नहीं कर रही। बस इस हिल स्टेशन को पॉलिटिकल टूरिज्म स्टेशन ही बनाया हुआ है।

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