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भगवान को  देखने के लिए अध्यात्मिक आंख का खुला होना जरूरी

हिमाचल दस्तक, शाहपुर।। ईश्वर मानव से दूर नहीं है, वह तो उसी के भीतर निवास करते हैं। उसके मन रूपी मंदिर में रहते हैं लेकिन मानव उन्हें पहचानने की व समझने की कोशिश ही नहीं करता। यह शब्द दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा शाहपुर में आयोजित की जा रही शिव कथा के दूसरे दिन आशुतोष महाराज की शिष्या कथा व्यास साध्वी सुश्री सुमेधा भारती ने कहे।

उन्होंने कहा कि इसका एक कारण तो यह है कि आज व्यक्ति के पास ईश्वर को समझने का समय ही नहीं है तथा वह अपने संसार के कार्यों में ही व्यस्त है और दूसरा कारण ईश्वर तक पहुंचने की वास्तविक विधि से अनजान होना है। उन्होंने कहा कि ईश्वर हमारे ही भीतर निवास करते हैं और उन तक पहुंचने का ढंग है। भगवान शिव शंकर की तीसरी आंख हमें यही समझाती है कि हम दो भौतिक आंखों से ईश्वर को नहीं देख सकते। क्योंकि ईश्वर तो अध्यात्म का विषय है और उसे देखने हेतु हमारी अध्यात्मिक आंख का खुला होना जरूरी है।

प्रजापति दक्ष ने भरी सभा में भगवान शिव का अनादर कर लिया था सर्वनाश

सती प्रसंग पर वाचन करते हुए साध्वी ने बताया कि सती के पिता प्रजापति दक्ष ने भरी सभा में भगवान श्री शिव का अनादर कर उन्हें यज्ञ के भाग से वंचित करने की सामूहिक घोषणा कर दी। शिव जो सभी के अधिष्ठाता परमात्मा है उनकी शक्ति व महिमा को दक्ष अपने अहंकार के कारण समझ नहीं पाया और उसने अपना सर्वनाश कर लिया।

साध्वी ने बताया कि मानव के जीवन में अभिमान एक ऐसा विकार है जो उसे आसुरी आचरण करने को विवश कर देता है। अभिमान का सर्प जब किसी को डंक मारता है तो साथ ही साथ क्रोध रूपी विकार भी अपने फन फैलाकर मानव के सर्वनाश हेतु तत्पर हो जाता है जिसका प्रजापति दक्ष जीवंत उदाहरण है। साध्वी ने कहा कि अहंकार मानव के विवेक का हरण कर लेता है फिर उसे सत्य-असत्य तथा अच्छे बुरे का भी भेद नहीं रह जाता। वह केवल मात्र स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है।

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