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लोकसभा चुनाव में क्या असर दिखाएगी नए कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति

राठौर के लिए चुनौतियां ही चुनौतियां

रविंद्र पंवर। शिमला
हिमाचल कांग्रेस के मुखिया को लेकर वर्षों से अंतर्कलह में जूझ रही पार्टी को आखिर नया अध्यक्ष मिल गया। कांग्रेस आलाकमान ने लोकसभा की चुनावी बेला पर सुखविंद्र सिंह सुक्खू को हटाकर कुलदीप राठौर को नया अध्यक्ष बनाया है। ऐसे समय में राठौर की ताजपोशी के क्या मायने हैं, यह राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि राठौर की नियुक्ति से वीरभद्र सिंह गुट सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को संबल मिला है, जिन्हें सुक्खू के समय एक तरह से नजरअंदाज किया जा रहा था।

दूसरी तरफ सुक्खू समर्थक और वीरभद्र के एंटी गुट में रहे लोग इस ताजपोशी की अलग ही व्याख्या कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण कि कुलदीप राठौर को संगठन का तो लंबा अनुभव है, लेकिन प्रदेश की राजनीतिक फील्ड में उनकी पकड़ न के बराबर है। लिहाजा अब प्रदेश कांग्रेस की बागडोर राठौर के हवाले कर दी गई है, तो जाहिर है कि पार्टी में नए समीकरण बनने लगे हैं। यह समीकरण आगामी लोकसभा चुनाव में क्या रंग दिखाएंगे, यह देखने वाली बात होगी।

गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह शुरू से सुखविंद्र सिंह की अध्यक्षता को चुनौती देते रहे हैं और पार्टी कार्यक्रमों और सार्वजनिक मंच से भी वह मुखर होकर उन्हें बदलने की मांग करते रहे थे। इस पर कांग्रेस आलाकमान ने कभी गौर नहीं किया, जिसका खामियाजा पार्टी को चुनावी राजनीति में भी उठाना पड़ा। बावजूद इसके भी सुक्खू अपने पद पर बने रहे। यही नहीं कांग्रेस में दूसरी श्रेणी के जीएस बाली और कौल सिंह ठाकुर सरीखे वरिष्ठ नेताओं को भी कभी सुक्खू की कार्यप्रणाली रास नहीं आई।

यह अलग बात है कि उन्होंने पूरे प्रदेशभर में कांग्रेस की एक नई जमात खड़ी की थी, लेकिन यह लोग लगभग हर जिले में वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करके उभरे थे। फिर चाहे प्रदेश का सबसे बड़ा कांगड़ा जिला हो, मंडी हो या फिर शिमला, हमीरपुर व ऊना या चंबा हो। सभी जगह सुक्खू ने पहले के स्थापित नेताओं के समानांतर तीसरी व चौथी श्रेणी के नेताओं को आगे किया था।

ऐसे में हर जगह वीरभद्र सिंह के समर्थकों और अन्य बड़े नेताओं की उपेक्षा हुई, जिससे उनका रोष बढ़ता जा रहा था। इसी बीच सुक्खू के विकल्प के तौर पर कुलदीप राठौर का नाम लंबे समय से चर्चाओं में था। इसे वीरभद्र सिंह भी मान रहे थे और यही कांग्रेस के लिए सुखद संकेत हैं कि अब पूर्व मुख्यमंत्री दोबारा से संगठन के साथ खड़े दिखेंगे। चूंकि प्रदेश के हर जिला, ब्लॉक व पंचायत स्तर तक वीरभद्र सिंह की पकड़ है और उनके समर्थक सक्रिय भी हैं, जिन्हें अब ऊपर से भी और सक्रिय होने का ईशारा मिल जाएगा।

इससे माना जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में वीरभद्र सिंह अपने पूरे रंग में नजर आएंगे। संभावना यह भी है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़े और उन्हें ही कंपेन कमेटी को मुखिया बनाया जाए। इससे निश्चित ही कांग्रेस को संबल मिलेगा, क्योंकि वीरभद्र की नाराजगी किसी भी सूरत पार्टी के लिए फायदेमंद नहीं रही है।

अब देखना यह भी होगा कि कुलदीप राठौर अपनी नई टीम कैसी बनाते हैं, इसमें सुक्खू की टीम को कितना अधिमान मिलेगा और वीरभद्र सिंह गुट की क्या स्थिति रहेगी। साथ ही वह प्रदेश के अन्य वरिष्ठ नेताओं को किस तरह से साथ लेकर चलेंगे, क्योंकि एक समय राठौर स्वयं एंटी वीरभद्र गुट के गिने जाते रहे थे। राठौर को पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा का भी खास समर्थक माना जाता है और इस नियुक्ति में उनका भी हाथ रहा है। ऐसे में राठौर को सब तरफ से बैलेंस बनाकर कांग्रेस को आगे बढ़ाना किसी चुनौती से कम नहीं है।

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