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dalai lama

एशियाई देशों ने भारत की पुरातन संस्कृति को माना

हिमाचल दस्तक ब्यूरो। धर्मशाला
तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा ने कहा कि भारतीय पुरातन संस्कृति विपाशना व समाधि पर आधारित है। इससे हम मनोस्थिति को नियंत्रित कर सकते हैं और इससे विश्वभर में शांति का संदेश फैलाने का काम हो सकता है।

उन्होंने कहा कि प्रेम ही असली धर्म है और इससे बड़ा कोई भी धर्म नहीं हो सकता। ये शब्द दलाईलामा ने मंगलवार को राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला के वार्षिक पारितोषिक समारोह में कहे। उन्होंने कहा कि वर्तमान में आधुनिकता के इस युग के दौरान विज्ञान व विकास के साथ भारत जैसा देश ही पूरे विश्व को पुरातन संस्कृति का ज्ञान दे सकता है। धर्म पर आधारित प्रसन्नता का कोई पैमाना नहीं होता। प्रसन्नता मूलत: हमारे भीतर से होनी चाहिए, अगर प्रसन्नता हमारे अंदर से है तो उसका कोई मोल नहीं।

कहा कि डिप्लोमेटिक प्रसन्नता मात्र एक दिखावा

उन्होंने कहा कि वर्तमान की पाश्चात्य संस्कृति में हम अपनी पुरातन संस्कृति को भूल रहे हैं जो कि एक चिंता का विषय है। दलाईलामा ने कहा कि हम अपनी पुरातन संस्कृति को संजोए रखे, और उसका अनुसरण भी करें। आज एशियाई देशों ने भारत की पुरातन संस्कृति को माना भी है। उन्होंने छात्रों को संदेश देते हुए कहा कि सभी का सच्चे मन से सम्मान करना चाहिए, कभी भी मनुष्य में मैं नहीं आनी चाहिए, अगर मनुष्य में मैं की भावना होगी तो वह कभी भी अपने जीवन में तरक्की नहीं कर सकता है और न ही दूसरों का कोई भला हो सकता है।

उन्होंने कहा कि डिप्लोमेटिक प्रसन्नता मात्र एक दिखावा है, उससे कभी हमें आत्मिक शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने कहा अंहिसा भी हमारे मन को शांत रखती है, असंतुलित मन कभी भी शांति प्रदान नहीं कर सकता है। स्वास्थ्य शरीर के लिए मानसिक शांति भी जरूरी है।
इंसान का मन शांत होगा तो वे अपनी मनोस्थिति को नियंत्रित कर पूरे विश्व में शांति का संदेश फैलाने कार्य कर सकता है। वहीं, कॉलेज के प्राचार्य सुनील कुमार मेहता ने अपने संबोधन में कॉलेज गतिविधियों का ब्योरा रखा।

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