सरकार ने दिए सीटी स्कैन, इंजेक्शन खरीद की जांच के आदेश

  • टांडा के प्रिंसिपल डॉ. भानु अवस्थी होंगे जांच कमेटी के अध्यक्ष
  • खरीद का सारा रिकॉर्ड जब्त 2011 से 2018 तक होगी जांच

राजेश मंढोत्रा। शिमला
राज्य के सबसे बड़े मेडिकल कालेज एवं अस्पताल आईजीएमसी में गरीब मरीजों के नाम पर लाखों के गोरखधंधे का अंदेशा है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि आईजीएमसी के रेडियो डायग्नोसिस विभाग में दो तरह के इंजेक्शनों की खरीद में वर्ष 2011 से खेल चल रहा था। ये इंंजेक्शन आईवीपी कोंट्रास्ट और मेटोक्लोप्रामाइड सीटी स्कैन के समय मरीजों को लगाए जाते हैं। इनकी खरीद खपत से ज्यादा की गई।

प्रति माह लाखों की हेराफेरी की बात सामने आने के बाद अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य आरडी धीमान ने इस मामले में जांच के आदेश दिये हैं। जांच कमेटी के अध्यक्ष टांडा मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल डा. भानु अवस्थी होंगे। इनके साथ टांडा के ही रेडियोलॉजी के विभागाध्यक्ष डा. दिनेश सूद तथा स्वास्थ्य निदेशालय से डीसीएफ दलीप शर्मा सदस्य, जबकि डीएमई दफ्तर से संयुक्त निदेशक राकेश कोरला कमेटी के सदस्य सचिव होंगे। स्वास्थ्य सचिव ने साथ ही खरीद से संबंधित सारा रिकार्ड जब्त करने के आदेश भी दिये हैं।

ये कमेटी सरकार को 15 दिन में रिपोर्ट देगी। जांच का दायरा वर्ष 2011 से 2018 तक होगा। इसके आधार पर ही आगामी कार्रवाई होगी। बताया गया कि सारे मामले का पता पिछले साल मार्च में तब लगा, जब रेडियो डायग्रोसिस विभाग में इन इंजेक्शनों के एक्सपायर होने की जानकारी मिली। विभाग के वर्तमान एचओडी ने शिकायत की कि जितनी सप्लाई रिकार्ड में है, वह जरूरत से ज्यादा है। ये खरीद कौन कर रहा है? इसके बाद प्रारंभिक पड़ताल शुरू हुई।

फेक खरीद का अंदेशा लग रहा रिकॉर्ड देखकर

रिकार्ड से पता चला कि आईजीएमसी में 21 अगस्त 2015 से 31 अक्तूबर 2017 तक 1944 मरीजों को आईवीपी कोंट्रास्ट इंजेक्शन लगे। इनमें से फ्री सुविधा वाले गरीब मरीज केवल 394 थे। इन्हीं के नाम पर ये इंजेक्शन तीन गुणा खरीदे गए। ये महंगे हैं और 4000 रुपये तक
एक इंजेक्शन की कीमत है। अंदेशा ये है कि खरीद ही फेक हो? और बाजार से खुद इंजेक्शन लाने वाले मरीजों के बचे हुए इंजेक्शन का प्रयोग ही गरीब मरीजों पर किया जाता हो।

खपत दिखाने को कागजों में भरी ओवरडोज

प्रारंभिक जांच के तथ्य बताते हैं कि जरूरत से ज्यादा खरीद को जायज ठहराने के लिए खपत को कागजों में ही बढ़ाया गया। इसके लिए मरीजों को ओवरडोज चढ़ाई हुई दर्शाई गई है। जबकि इस इंजैक्शन की डोज 50 एमएल से ज्यादा नहीं लगती। रिकार्ड बताता है कि जरूरत बताते ही अगले दिन सप्लाई आ जाती थी। सप्लायर भी शिमला का ही लोकल है। सारा खेल रेडियोडायग्रोसिस विभाग, एमएस आफिस और सप्लायर के बीच था।

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