Patients who are defeated by the 'Ayushman' hassles

लंबी प्र्रक्रिया में कई रोड़े, बीमारी के बजाय दवा के आधार पर पैकेज तोड़े , दाखिल हुए बिना इलाज नहीं, एडमिशन और डिस्चार्ज में लग रहे कई घंटे

हिमाचल दस्तक ब्यूरो। शिमला : केंद्र की मोदी सरकार की मंशा ‘आयुष्मान’ बीमा योजना के जरिये करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य रक्षा देने की रही हो, लेकिन इस योजना के झंझट इतने हैं कि मरीज इनसे ही हार जा रहे हैं। राज्य के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी में अभी तक आयुष्मान की प्रक्रिया नहीं सुधरी है।

यह योजना सबसे पहले आईजीएमसी में ही लागू हुई थी। 174 अन्य अस्पताल भी इंपैनल हैं। ‘हिमाचल दस्तक’ ने इस बारे में मरीजों, डॉक्टरों और दवा विके्रताओं में से सभी से बात की और सभी इस योजना से परेशान हैं। कारण यह कि इस लंबी प्र्रक्रिया में कई रोड़े हैं। आरबीएसवाई में बीमारी के आधार पर इलाज का पैकेज बनता था, लेकिन अब लिखी गई दवा के आधार पर टुकड़ों में पैकेज तय हो रहा है। इससे कैंसर मरीजों की एक कीमोथेरेपी का खर्चा भी पूरा नहीं हो रहा। दाखिल हुए बिना इलाज नहीं मिलेगा और एडमिशन तथा डिस्चार्ज में ही कई घंटे लग रहे हैं।

सबसे ज्यादा परेशान आईजीएमसी कैंपस से बाहर स्थित अस्पतालों के मरीजों को है। मसलन कैंसर मरीज और केएनएच से आने वाले मरीज। कैंसर मरीजों को पहले एडमिशन के लिए 200 सीढिय़ां चढऩी पड़ रही है और फिर दवा लेने के लिए चार बार ऊपर नीचे जाना पड़ रहा है। यानी जिस मरीज के साथ कोई परिजन नहीं है, उसे इलाज नहीं मिल सकता। आईजीएमसी और स्वास्थ्य विभाग के पास आरएसबीवाई का अनुभव था, लेकिन फिर भी आयुष्मान को लेकर पेश आ रही दिक्कतों पर पहले नहीं सोचा गया।

स्कीम के लिए दो बार पर्ची फोटोस्टैट करनी पड़ती है, लेकिन आईजीएमसी के पास एक फोटो स्टैट मशीन तक भीतर नहीं है। आईजीएमसी प्रशासन का कहना है कि इस योजना के लिए और स्टाफ की जरूरत है, जिस बारे में सरकार को अवगत करवा दिया गया है।

रोड़ा नंबर 1 : मरीज का फोटो व्हाट्सऐप करो

आयुष्मान में इलाज लेने के लिए स्मार्ट कार्ड होने के बावजूद एक अजीब शर्त है कि मरीज का फोटो आईजीएमसी में बनाए काउंटर पर चिपकाए जियो के नंबर पर व्हाट्सऐप करना होगा। दूरदराज से आए मरीज अब भी की-पैड वाले पुराने मोबाइल प्रयोग करते हैं। मरीज यदि बुजुर्ग दंपत्ति हैं, तो भी व्हाट्सऐप संस्कृति से वाकिफ नहीं हैं। कैंसर अस्पताल में कई बुजुर्ग मरीज व्हाट्सऐप के कारण बिना इलाज भटकते हुए मिल रहे हैं।

रोड़ा नंबर 2 : नर्सों से लेकर डॉक्टर के साइन

आरएसबीवाई में केवल डॉक्टर के साइन फ्री दवाओं वाली पर्ची पर होते थे, लेकिन अब पहले वार्ड में नर्स करेगी, फिर मरीज को नर्सिंग सुपरिटेंडेंट से साइन करवाने हैं और फिर जाकर डॉक्टर के साइन होंगे। बाद ही दवाएं मिलेंगी। इन तीन में से यदि एक भी नहीं मिले तो इलाज नहीं मिलेगा। वार्डों में तैनात डॉक्टर खुद परेशान हैं। कह रहे हैं-एक ही पर्ची तीन-तीन बार लिखनी पड़ रही है। आयुष्मान ने क्लर्क बना दिया है।

रोड़ा नंबर 3 : पैकेज के लिए मंजूरी का इंतजार

औपचारिकताएं पूरी होने के बाद दोबारा आयुष्मान काउंटर पर पहले से अप्रूव्ड पैकेज की मंजूरी लेना जरूरी है। यह मंजूरी चंडीगढ़ स्थित उस कंपनी से आती है, जिसके पास यह हेल्थ बीमा है। वहां भी डॉक्टर बैठे हैं, पैकेज बदल देते हैं। जिसका 6 हजार का पैकेज हो, उसका कभी दो हजार मंजूर होता है, कभी 4 हजार। बंजार से आए 9 साल के बच्चे को 6 दिन केवल इसलिए इलाज नहीं मिल पाया, क्योंकि पैकेज तय नहीं हो पाया।

औपचारिकताएं पूरी होने के बाद दोबारा आयुष्मान काउंटर पर पहले से अप्रूव्ड पैकेज की मंजूरी लेना जरूरी है। यह मंजूरी चंडीगढ़ स्थित उस कंपनी से आती है, जिसके पास यह हेल्थ बीमा है। वहां भी डॉक्टर बैठे हैं, पैकेज बदल देते हैं। जिसका 6 हजार का पैकेज हो, उसका कभी दो हजार मंजूर होता है, कभी 4 हजार। बंजार से आए 9 साल के बच्चे को 6 दिन केवल इसलिए इलाज नहीं मिल पाया, क्योंकि पैकेज तय नहीं हो पाया।

“आईजीएमसी और स्वास्थ्य विभाग को आयुष्मान की प्रक्रिया को सरल करने के साफ निर्देश हैं। यदि इसके बाद भी मरीज परेशान हैं, तो जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई होगी। “
-आरडी धीमान अतिरिक्त मुख्य सचिव स्वास्थ्य

 

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