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1890 में राजा श्याम ने रखी थी चौगान की नींव

24 परगना की जनता के सहयोग से बनाया गया था चौगान

सोमी प्रकाश भुव्वेटा। चंबा
हिमाचल के जिस ऐतिहासिक चौगान को चंबा नगर की शान माना जाता है। कभी इस चौगान की जगह होने वाले लंबे-चौड़े उबड़-खाबड़ मैदान से कल-कल करती रावी नदी बहा करती थी। वर्तमान में पश्चिम छोर पर बना हरिराय मंदिर उस वक्त भी विद्यमान था। कहते हैं कि रावी का एक हिस्सा जब यहां से गुजरता था, तो उस वक्त लोग रावी में होने वाले पत्थरों का सहारा लेकर हरिराय मंदिर जाते थे। भू वैज्ञानिक भी खुलासा करते हैं लगभग 2000 वर्ष पूर्व यहां पर रावी बहती होगी।

बाद में जैसे-जैसे आबादी बढऩे पर नगर बसता गया और इसका इस्तेमाल बढऩे पर उबड़-खाबड़ रहने वाला मैदान समतल होता गया। वैसे, ऐतिहासिक चौगान के निर्माण का श्रेय राजा श्याम सिंह को जाता है। 1890 में इस खूबसूरत ऐतिहासिक चौगान को संवारने का काम शुरू हुआ। इस चौगान को बनाने में चंबा नगर के शहरी और ग्रामीण क्षेत्र की जनता का महत्वपूर्ण योगदान रहा। चंबा नगर की जनता ने एकजुट होकर पहले तो इस उबड़-खाबड़ मैदान को समतल बनाया।

मैदान को चौगान का स्वरूप दे पाना किसी बड़ी चुनौती से कम नही था

उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टुकड़े मैदान में बिछाकर उसके ऊपर पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े डालें, ताकि इसके ऊपर पानी न ठहर सके। इस उबड़-खाबड़ मैदान के इर्द-गिर्द रेत बिखरी होने के कारण इस मैदान को चौगान का स्वरूप दे पाना किसी बड़ी चुनौती से कम नही था। जाहिर तौर पर इसके लिए जनता का सहयोग आपेक्षित था। बहरहाल, चंबा नगर के 24 परगनों की जनता ने अपने-अपने एरिया की उपजाऊ मिट्टी खालड़ में (भेड़ की खालों में) भरकर इस मैदान में पहुंचाई और फिर इसे इस मैदान पर बिखेकर इसे समतल कर दिया गया।

उसके बाद चौबीस परगना के लोगों ने मिलकर इस मैदान पर कलकता घास/द्रुब का बीज लगाया। इस तरह से जब यह बीज उगा तो ऐतिहासिक चौगान का स्वरूप ले लिया। आधुनिकता के मोहपाश में फंसकर चंबा नगर के बड़े चौगान को टुकड़ों में बांटने का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि अब चौगान पांच भागों में बांट दिया गया है।

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