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फतेहपुर के पहलवान का आज तक नहीं छूटा कुश्ती का शौक

धोबी दांव-पेच के कायल थे लोग

प्रशांत ठाकुर। डाडासीबा
हिमाचल प्रदेश की धरती पर एक से बढ़कर एक पहलवानों ने जन्म लिया है। इनकी ख्याति दूर-दूर तक रही है। जगदीश बिलासपुर पहलवान से लेकर अली चंबा तक इसमें शामिल है। ये पहलवान काफी फेमस हुए, लेकिन कई पहलवान ऐसे भी हुए, जो किसी भी मायने में जगदीश बिलासपुर और अली चंबा पहलवान से कम नहीं थे, लेकिन उनको वो सम्मान नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे।

बात एक ऐसे पहलवान की, जिसे हिमाचल केसरी का खिताब मिला था। उस वक्त में ऐसा कोई पहलवान नहीं होगा, जिसे इसने मात नहीं दी हो। इस महान पहलवान का नाम है जोगी पंजाब सिंह। उस दौर में कहा जाता था कि जोगी पहलवान के सामने कोई भी पहलवान आने से डरता था। 70 के दशक में जोगी पहलवान की कुश्ती अखाड़े में जबरदस्त एंट्री हुई और उनके धोबी दांव पेच के हिमाचली दीवाने हो गए।
जोगी के अनूठे दांव पेचों के कारण उनकी डिमांड बढ़ गई।

उनको हर जगह कुश्ती लडऩे के लिए बुलाया जाने लगा। वर्ष 1971 यानी सालभर के भीतर उन्होंने 100 कुश्तियां लड़ी।

जोगी पहलवान का जन्म कांगड़ा जिले के फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र में साल 1950 में एक किसान परिवार और वदवाड गांव में हुआ था। उनके दादा कालू दास भी अच्छे पहलवान थे। जोगी ने अपने दादा और मशहूर छज्जू पहलवान से पहलवानी के गुर सीखे ।

पंजाब उस वक्त जोगी को देखकर अचंभित रह गया जब चंडीगढ़ में आयोजित बड़े दंगल में जोगी ने मशहूर पहलवानों को पराजित किया तथा चंडीगढ़ के 20 सेक्टर में उन्होंने अंबाला के 2 पहलवानों के चैलेंज को स्वीकार किया तथा जीतने पर उन्हें शेर-ए-हिमाचल का खिताब मिला।जोगी पंजाब सिंह शाकाहारी और सात्विक हैं। पुरस्कार के रूप में आज जोगी पहलवान के घर पर सैकड़ों पीतल की गागरें, गुर्ज व बाल्टियां आदि मौजूद हैं।

आज भी वे अपनी हम उम्र के पहलवान के साथ कुश्ती लड़ते हैं, लेकिन कभी भी पराजित नहीं हुए। करीबन आधा दंगल हो जाने के उपरांत जोगी का अखाड़े के अंदर प्रवेश होता था। लोग तालियों और सीटियों के साथ उनका स्वागत करते थे । जोगी को पैसे देने के लिए दशकों में होड़ मच जाती थी। पूर्व मंत्री सुजान सिंह पठानिया और उद्योग मंत्री बिक्रम सिंह ठाकुर भी पंजाब सिंह जोगी पहलवान के फैन हैं ।

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