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sitala mata temple

शीतला माता का प्रसाद ग्रहण करने से दूर होते हैं गुप्त रोग

हिमाचल दस्तक। मैहरे
देवभूमि हिमाचल प्रदेश में ऐसे कई मंदिर हैं जिनका इतिहास सैंकड़ों वर्ष पुराना है। ऐसा ही एक प्राचीन मंदिर बड़सर विस क्षेत्र के गांव गारली (वाहिना) में स्थित है। इसका इतिहास मुगल साम्रज्य के समय का है। ग्राम पंचायत गारली के गांव वाहिना में स्थित यह मंदिर शीतला माता का है, जो श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। शीतला माता मंदिर इतिहास के पन्नों में कई गाथाएं संजोये हुए है। शीतला माता को माता ज्वाला माता की बहन भी कहा जाता है।

मंदिर कमेटी प्रधान हंस राज, सचिव अशोक कुमार, रोशन लाल, रजिंद्र कुमार, कमल जीत, केशव दत्त, प्रकाश चंद, बंशी लाल, ज्ञान चंद, सुरेश कुमार आदि ने बताया कि शीतला माता का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। बात अकबर बादशाह के समय की है। एक बार महाराजा रणजीत सिंह कांगड़ा के ब्रजेश्वरी मंदिर आए थे। उनकी मंदिर में तीन मूर्तियां भेंट करने की इच्छा हुई। मूर्तियां बिलासपुर जिला के बछरेटू में बनवाई गईं। पालकी में रखकर इन्हें वाहिना होते हुए कांगड़ा ले जाया जा रहा था।

सर्वप्रथम वाहिना गांव के रिटायर्ड पोस्टमैन साधु राम ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था

वाहिना गांव में आराम करने के उपरांत जैसे ही लोगों ने मूर्तियां उठाईं। इनमें से एक मूर्ति इतनी भारी हो गई कि उसे उठाना किसी के भी बस का नहीं रहा। महाराजा को जैसे ही सूचना दी गई उन्होनें वहीं मूर्ति को स्थापित करने के आदेश दिए और मंदिर का निर्माण करवाया। यह मंदिर आज शीतला माता के नाम से प्रसिद्ध है। सर्वप्रथम वाहिना गांव के रिटायर्ड पोस्टमैन साधु राम ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। यहां नवरात्रों में शीतला माता की विशेष पूजा की जाती है और श्रीमद्भागवत कथा का भी आयोजन किया जाता है।

मान्यता है कि शीतला माता का प्रसाद ग्रहण करने से गुप्त रोगों से मुक्ति मिलती है। शीतला माता को कुलदेवी के रूप में भी मानते हैं। फागुन महीने की अष्टमी में यहां मेला करवाया जाता है इसी उपलक्ष्य में शनिवार को यहां भंडारे का प्रसाद वितरित किया गया। मंदिर कमेटी के पदाधिकारियों ने बताया कि 18 से 24 मार्च तक यहां श्रीमद् भागवत कथा कराई जाएगी।

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