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जीत के करना पड़ रहा संघर्ष

बिना तैयारी पार्टी के नए प्रयोग से नाराज नेता व कार्यकर्ताओं को उम्मीदवार प्रचार में चलाने में नाकामयाब

हिमाचल दस्तक। भोरंज 

अपनों के ही साये को पीट रही भोरंज बीजेपी चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में भी कार्यकर्ताओं से अलग-थलग रहकर जीत की परंपरा को कायम रखने के लिए संघर्ष कर रही है। चुनाव में पिछड़ी बीजेपी जीत की हसरत लेकर अपने और परायों से जूझ रही है। लगातार बीजेपी की सत्ता को कायम रखने वाले धीमान की धरती पर हो रहे पार्टी के नए प्रयोग में चुनावी प्रबंधन की बागडोर नए सियासी गुरु ने अपने हाथ रखकर बीजेपी के परंपरागत कैडर को बेशक अपने डंडे से हांकने का प्रयास किया है, लेकिन यह नया प्रयोग और प्रयास भोरंज में सफल नहीं हो पाया है। जिनके दम पर भोरंज में हर बार नया प्रयोग सफल होता रहा है, वह चुनाव में अंतिम दम तक अलूफ है।bhoranj bjp

चुनावी शोर के बावजूद अविश्वास के सन्नाटे में बेशक पार्टी की चीखें निकल रही हो, लेकिन टिकट के नाम पर नाराज कार्यकर्ता इन चीखों से भी नहीं पसीज रहा है। हैरानी यह है कि भोरंज बीजेपी के नए सियासी गुरु चुनावी सूरज पर प्रतिबंध लगाकर रिश्तों के अंधेरों पर जीत का भरोसा कर रहे हैं। बीजेपी के गढ़ भोरंज में बिना तैयारी प्रत्याशी बदलने का प्रयोग भी पार्टी के लिए भारी साबित हुआ है। प्रत्याशी का क्षेत्र के बाहर से होना, फेस नया होना भी चुनाव में भोरंज बीजेपी के लिए परेशानी का सबब बना है।

चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में सुरेश कुमार ने अपनी पूरी ताकत प्रचार में झोंक दी

भोरंज के चुनाव प्रबंधन में संगठन व नेताओं को अलग करके जीत के प्रयोग में लगे बीजेपी के नए गुरु का अडिय़ल रुख व रवैया भी चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं के हौसलों को पस्त कर रहा है। उधर अपनी सादगी व गुरुवत को जीत का मंत्र बनाकर प्रयोग कर रहे सुरेश कुमार सहानुभूति की लहर पर सवार है। सहानुभूति की यह लहर भोरंज के एक-चौथाई हिस्से पर देखी जा सकती है। इसी लहर से उत्साहित होकर चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में सुरेश कुमार ने अपनी पूरी ताकत प्रचार में झोंक दी है।bhoranj bjp

उधर, मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के इस आदेश पर कांग्रेस नेता प्रेम कौशल व उनके समर्थक जी-जान से प्रचार में जुटे हैं। जो अपनी पूरी ताकत लगाकर भोरंज कांग्रेस को 30 वर्षों की लगातार हार को जीत में बदलना चाह रहे हैं। ऐसे में स्व. धीमान की धरती भोरंज में कार्यकर्ताओं की नाराजगी व मतदाताओं की चुप्पी में पार्टी अपने लिए कड़ा संवाद व सबक सुन सकती है। उधर, संघ के दखल व आदेश के बाद भोरंज संघर्ष व विकास समिति बाहरी तौर पर जनसभाएं व रोड शो के माध्यम से पार्टी के लिए संघर्षरत है।

यह संघर्ष नतीजों में कितना बदल पाता है, चुनाव परिणाम बताएगा। पूर्व मुख्यमंत्री धूमल के दखल के बाद स्थानीय संगठन समिति व संघर्ष समिति के तमाम लोग कहने को तो उम्मीदवार के साथ है, लेकिन फील्ड में किसी को भी प्रत्याशी अपने साथ नहीं चला पाया है। भोरंज बीजेपी के नए सियासी गुरु के दावे मानें तो इस बार पार्टी और भी बड़े मार्जिन से भोरंज में सीएम फेस के कारण जीत रही है।

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