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administrative tribunal

सरकार ने पूछा, ट्रिब्यूनल को खत्म करने का प्रोसेस बताओ

  • कार्मिक विभाग के प्रस्ताव पर मुख्य सचिव के साथ बैठक
  • मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जल्द ले सकते हैं कोई बड़ा फैसला

हिमाचल दस्तक ब्यूरो। शिमला
राज्य प्रशासनिक ट्रिब्यूनल पर फिर खतरा मंडरा गया है। लोकसभा चुनाव और मेंबर्स की दो रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया के बीच राज्य सरकार ने शीर्ष अफसरशाही से पूछा है कि ट्रिब्यूनल को बंद करने का प्रोसेस क्या है? कार्मिक विभाग ने इस बारे में प्रस्ताव बनाया है। इस पर वीरवार शाम को मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मुख्य सचिव के साथ बैठक की है।

संभवत: शुक्रवार को भी फिर से चर्चा होगी। प्रशासनिक ट्रिब्यूनल राज्य के कर्मचारियों के सेवा नियमों और तबादलों संबंधी मामलों की सुनवाई करता है। ट्रिब्यूनल के न होने पर ये सभी केस हाईकोर्ट आते हैं। वर्तमान भाजपा सरकार के समय ही पिछले साल भी ये प्रक्रिया शुरू हुई थी कि ट्रिब्यूनल को बंद कर दिया जाए।

तब कुछ कैबिनेट मंत्री अपने विभागों में हुए तबादलों के मामलों में धड़ाधड़ स्टे मिलने से परेशान थे और इन्होंने ही दबाव बनाया था कि ट्रिब्यूनल कर्मचारी न्याय के बजाय काम में बाधा का पर्याय बन गया है। हालांकि तब मुख्यमंत्री ने खुद हस्तक्षेप कर संवाद किया और मसला टल गया। अब दोबारा ये कोशिश शुरू हुई है। सूत्र बताते हैं कि इस बार भाजपा और अन्य संबध संगठनों की ओर से भी राय आई है कि इसे बंद कर देना चाहिए। इस बारे में फैसला अब मुख्यमंत्री ही लेंगे।

क्या दो मेंबर्स के चयन को लेकर है कोई विवाद?

ट्रिब्यूनल में वर्तमान में एक चेयरमैन और एक ज्यूडिशियल मेंबर ही हैं। दो प्रशासनिक मेंबर्स के पद खाली हैं। इनके चयन के लिए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में हाल ही में बैठक हुई है। इसमें 1985 बैच के दो आईएएस अधिकारियों का चयन किया गया था। इसमें मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. श्रीकांत बाल्दी और पीडब्ल्यूडी की अतिरिक्त मुख्य सचिव मनीषा नंदा शामिल हैं। संयोगवश दोनों राजस्थान से हैं। अब ये सवाल उठ रहा है कि क्या इस चयन के बाद पैदा हुई स्थितियों के कारण सरकार दूसरे विकल्प की ओर बढ़ी है?

धूमल ने खत्म किया था, वीरभद्र ने बहाल किया

कर्मचारियों से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए राज्य में 1986 में प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था। इसके बाद मुख्यमंत्री बने शांता कुमार ने इसे खत्म करने के प्रयास किए, लेकिन कर नहीं पाए थे। लेकिन वर्ष 2008 में धूमल सरकार ने ट्रिब्यूनल को निरस्त कर सारे केस हाईकोर्ट शिफ्ट करवा दिए थे। फिर वीरभद्र सिंह सरकार ने 2014 में इसे फिर बहाल कर दिया। इसके बाद संबंधित मामले दोबारा हाईकोर्ट से ट्रिब्यूनल में चले गए। लेकिन खाली हुए प्रशासनिक सदस्यों के पदों को समय पर नहीं भरा गया।

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