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With the ideals of Pu, with 55 years of this charkha of joy

हिमाचल दस्तक : जनजातीय जिला लाहुल स्पिति के ठोलंग निवासी सुखदयाल का जीवन चरखा,खड्डी,धागों के ताने बाने से उलझ कर उनके चाहने वालों को उम्र के 68 वें पड़ाव में भी सुन्दर वस्त्र तैयार कर उनमें खुशी का संचार करना है।

गौर रहे ये शख्स आजीवन गांधी जी के बुनकर विधा और चरखे के साथ साथ बिल्कुल साधरण जीवन यापन करने में विश्वास रखते हैं।अपने जीवन काल मे परिस्थितियां चाहे कैसे भी आई हो इन्होंने खड्डी और धागा तथा चरखा कभी नही छोड़ा।हालांकि सरकारी नोकरी भी लम्बे समय तक क़ी मगर बुनकर विधा को साथ साथ चलाये रखा।यही कारण है कि इन्होंने अपने भरे पूरे परिवार का पालन पोषण बहुत ही सरलता से करवाया।सुखदयाल कहते हैं कि खड्डी और चरखा मेरी पूजा है।इसी के बल बूते जहां में अपने परिवार का लालन पालन अच्छे से कर पाया हूँ वही मेरे सेहत का राज भी इसी खड्डी में लगातार कठिन परिश्रम और साधना है।गौर रहे सुखदयाल सेन को आज भी किसी किस्म का शारीरिक कष्ट नही है।

रक्तचाप पूछें तो एक हृष्ट पुष्ट नवयुवक जैसे ही है।भरे पूरे शरीर और सुडौल कदकाठी वाले इन शख्स से आज भी कोई अजनवी मिलता है तो इन्हें देख कर गौरव की अनुभूति करता है।अपने बुनकर विधा के दक्ष इनके चाहने वालों और इनके पास बुनाई करवाने वालों का अटूट विश्वास और प्रेम इन्हें और अधिक प्रसन्न करवाता है।मजेदार बात यह है कि आज के इस इकीसवीं सदी में इनके पास वही पुराना तोल तराजू है और छब्बा बट्टे भी वही जमाने के।यही नही एक आध बट्टे तो पत्थर के तोल के बना रखें हैं फिर भी मजाल है कोई भी इनका दीवाना इन्हें पूछे।यही नही कभी कभी तो सुत या धागे को हाथ मे ही तोल कर अंदाजे से ही बता देते हैं कि इतना बजन होगा और इससे आप का इतना मीटर चादर या पट्टी का निर्माण होगा।सुखदयाल के सादगी का अपने इलाके में डंका है।

इसे और अधिक मजबूती तब मिली जब भूटिको के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री सत्यप्रकाश ठाकुर ने इन्हें स्वर्गीय ठाकुर वेद राम राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा और बुनकरों के शुमार में मुख्य धारा पर लाया।जिसके लिए सुखदयाल सेन हमेशा ठाकुर सत्यप्रकाश का आभार प्रकट करते है।यह सिलसिला फिर रुका नही।सुखदयाल को कई संस्थाओं समेत कुल्लू और लाहुल स्पिति प्रशासन ने भी सम्मानित किया।कई सम्मानीय अखबारों तथा चैनलों ने इनके काम की सराहना की।प्रदेश की कला एवं भाषा विभाग की सचिव पूर्णिमा चौहान इनके कार्य और गांधी प्रेम से प्रभावित हैं। उन्होंने सरकारी प्रेस में छपने वाले गिरिराज, हिम्प्रस्त और आर्कईव की विशेष पुस्तिका में इन्हें प्रमुख स्थान देने की बात कही है।सुखदयाल कहते हैं कि इस विधा को आगे बढ़ाने के लिए उनके पुत्र काम कर रहे हैं जो अच्छी बात है।उनका युवाओं से भी आह्वान है कि बुनकर विधा कक जरूर अपनाएं।

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