Diwali

Diwali-: दीवाली या दीपावली एक ही त्यौहार दो नाम है । लेकिन दीवाली का त्यौहार आते ही सब दिलों में हर्ष उल्लास पैदा हो जाता है । दीवाली के दिन हर घर दीप जलाएं जाते है । दीपों, मोमबत्तियों और बिजली की रोशनी से घर का कोना-कोना प्रकाशित किया जाता है। इसलिए दीपावली को रोशनी का पर्व भी कहा जाता है। दीवाली पर पटाखे जलाएं जाते है । सब लोग आपस में मिलकर एक दूसरे को बधाईयां देते है और मिठाईयां बाटतें है। दीपावली कार्तिक माह की अमावस को मनाई जाती है। रोशनी से अंधकार दूर हो जाता है। यह त्यौहार अपने साथ ढेर सारी खुशियां लेकर आता है। दिवाली के एक-दो हफ्ते पहले से ही लोग अपने घरों साफ़ सफ़ाई में लग जाते है । अमावस्या से दो दिन पहले, त्रयोदशी ‘धनतेरस’ के रूप में मनाई जाती है | दरअसल, इस दिन भगवान् धन्वन्तरी जी का प्रागट्य हुआ था जो सबको आरोग्य जीवन देते हैं लेकिन कालांतर में यह दिन कोई न कोई नया बर्तन, सोना ,चांदी आदि खरीदने के रूप में प्रचलित है । इस लोग कोई कोई नई चीज़ ख़रीद कर अपने घर लाते है ।800_720

दीवाली के दिन अयोध्या के राजा राम लंका के राजा रावण का वध करके अयोध्या वापस लौटे थे, उनके अयोध्‍या आने की खुशी में दीपावली का त्‍योहार मनाया जाता है। दीपावली मनाने के पीछे अलग अलग राज्‍यों और धर्मो में अलग-अलग कारण व्‍याप्‍त हैं।

भगवान राम की विजय-: हिंदू धर्म में मान्‍यता है कि दीपावली के दिन आयोध्‍या के राजा श्री राम ने लंका के राजा रावण का वध किया था, वध करने के बाद वे अयोध्‍या वापस लौटे थे। उनके अयोध्‍या लौटने की खुशी में वहां के निवासियों ने दीप जलाकर उनका स्‍वागत किया था और खुशी मनाई थी। उसी दिन से दीपावली का त्‍यौहार मनाया जाने लगा ।
श्री कृष्ण ने किया था नरकासुर का वध-: दीवाली के एक दिन पहले राक्षस नरकासुर ने 16,000 औरतों का अपहरण कर लिया था तब भगवान श्री कृष्ण ने असुर राजा का वध करके सभी औरतों का मुक्‍त किया था, कृष्ण भक्तिधारा के लोग इसी दिन को दीपावली के रूप में मनाते हैं।
विष्णु जी का नरसिंह रुप -: एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विंष्णु ने नरसिंह रुप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था, इसी दिन समुद्रमंथन के दौरान लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए थीं।

                                          दीवाली(Diwali) की पूजा विधि 8_720

दीवाली के त्योहार पर लक्ष्मी- गणेश पूजन का खास महत्व है। इस दिन सभी घरों में लक्ष्मी गणेश का पूजन किया जाता है। गणेश जी की पूजा करने के लिए सबसे पहले आप उनकी मूर्ति स्थापित करें, फिर एक सुपारी लेकर इसे अच्छे से साफ करें। इसके बाद सुपारी को मौली में बांध लें। मौली से बंधी सुपारी को चांदी, तांबा या अन्य किसी धातु से बने बर्तन पर रखें। इसके बाद गंधाक्षत अर्पण करें और ऊं ‘भूर्भुवा स्वाह श्री गणपतये, इहागच्छा, इहा तिस्ठ, मम पूजम गृहा’ मंत्र का उच्चारण करें। इसके बाद गणेश जी पर अक्षोरत अर्पण करें और गणेश जी का ध्यान करें। गणेश जी का ध्यान करते समय आपके हाथ आह्वान मुद्रा में रहने चाहिए। आह्वान मुद्रा में फिर से ‘भूर्भुवा स्वाह श्री गणपतये, इहागच्छा, इहा तिस्ठ, मम पूजम् गृहा’ का जाप करें। इसके बाद गणेश जी के आगमन का स्वागत करें। इसके बाद लक्ष्मी पूजन के लिए सबसे पहले लक्ष्मी जी का ध्यान करें। इसके बाद लक्ष्मी जी का आह्वान करें। आह्वान के लिए ‘आगच्छा देव -देवेशी! तेजोमयी महा-लक्ष्मी, क्रियामणम माया पूजाम्, गृहाम सुर वंदिते!’ इस मंत्र का उच्चारण करें। लक्ष्मी जी के आह्वान के बाद उन्हें दोनों हाथों की गदेलियां जोड़कर पुष्प समर्पित करें फिर लक्ष्मी- गणेश पर मिठाई समर्पित करें ।

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